मप्र के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति को लेकर छिड़ा विवाद अब केवल एक सरकारी नीति तक सीमित नहीं रह गया है। इसने सनातन परंपरा, सामाजिक समानता और संविधान की मूल भावना से जुड़े एक ऐसे प्रश्न को सामने ला खड़ा किया है, जिससे लंबे समय तक बचने की कोशिश होती रही है। सवाल सीधा है-क्या सरकारी मंदिरों में पुजारी बनने का अधिकार केवल जन्म से ब्राह्मण होने पर निर्भर करेगा, या फिर धार्मिक ज्ञान, साधना, शास्त्रों की समझ और निष्कलंक आचरण को भी समान महत्व मिलेगा? इस प्रश्न का उत्तर न राजनीतिक नारों में मिलेगा, न जातीय गोलबंदी में। इसका उत्तर धर्मग्रंथों, भारतीय परंपरा और संविधान-तीनों के समन्वय में तलाशना होगा।
भगवद्गीता (4.13) में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं-‘ चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः’, अर्थात वर्ण की व्यवस्था जन्म से नहीं, बल्कि गुण और कर्म के आधार पर है। महाभारत और उपनिषदों में भी अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहां व्यक्ति का सम्मान उसके ज्ञान, तप, चरित्र और आचरण से निर्धारित होता है। सत्यकाम जाबाल का प्रसंग इसका प्रमाण है कि सत्य और पात्रता को जन्म से ऊपर रखा गया। भक्ति आंदोलन ने तो इस सोच को और अधिक व्यापक बना दिया।
श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रसिद्ध वचन है-‘किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र केने नय; येइ कृष्ण-तत्त्व-वेत्ता, सेइ गुरु हय।’ अर्थात ब्राह्मण, संन्यासी या शूद्र-यदि कोई कृष्ण-तत्त्व का ज्ञाता है, तो वही गुरु बनने का अधिकारी है। संत रविदास, कबीर, नामदेव और चोखामेला ने भी ईश्वर तक पहुंचने के अधिकार को जन्म नहीं, बल्कि भक्ति और साधना से जोड़ा। निस्संदेह, सनातन धर्म में अनेक मंदिर आगम शास्त्रों और संप्रदायगत परंपराओं के अनुसार संचालित होते हैं। उन धार्मिक परंपराओं का सम्मान होना ही चाहिए। लेकिन जब किसी मंदिर का संचालन और पुजारियों की नियुक्ति राज्य के नियंत्रण में हो, तब सरकार यह नहीं कह सकती कि वह संविधान के समान अवसर के सिद्धांत से ऊपर है। सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और समान अवसर अनिवार्य शर्त हैं।
इसलिए असली सवाल दलित, आदिवासी या ओबीसी को पुजारी बनाने का नहीं, बल्कि योग्यता और आचरण को जाति से ऊपर रखने का है। यदि कोई अभ्यर्थी वेद, आगम, मंत्रोच्चार और पूजा-विधि में पूर्ण प्रशिक्षित है, तो क्या केवल उसका जन्म उसे अयोग्य घोषित कर देगा? यदि ऐसा है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 की भावना के साथ-साथ स्वयं गीता के ‘गुण-कर्म’ सिद्धांत पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अब यह विवाद न्यायालय के सामने है और अंतिम निर्णय वहीं होगा। लेकिन समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि क्या हम आज भी जन्म आधारित सोच से बाहर निकलने को तैयार हैं? सनातन धर्म की शक्ति उसकी व्यापकता, समावेशिता और ज्ञान पर आधारित परंपरा में रही है, न कि संकीर्णता में। यदि योग्यता ही सर्वोपरि है, तो उसे जाति की दीवारों में कैद नहीं किया जा सकता।
-मिलिंद ठाकरे

