नई दिल्ली: ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल काम की प्रकृति एक जैसी होने के आधार पर कर्मचारी समान वेतन का दावा नहीं कर सकते। इसके लिए नियुक्ति का तरीका, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, जिम्मेदारियां और जवाबदेही जैसे पहलुओं में समानता साबित करना जरूरी है।
यह फैसला केरल के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में सीधे भर्ती हुए उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कनिष्ठ शिक्षकों की याचिकाओं पर आया। इन शिक्षकों ने स्थानांतरण या पदोन्नति के जरिए नियुक्त किए गए शिक्षकों के बराबर वेतनमान की मांग की थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने उनकी अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
सिर्फ एक जैसा काम पर्याप्त नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समान वेतन का दावा करने के लिए दोनों पदों की वास्तविक तुलना जरूरी है। अदालतें कर्तव्यों, जिम्मेदारियों, आवश्यक योग्यता, अनुभव, काम की परिस्थितियों, नियुक्ति के स्रोत और जवाबदेही के स्तर जैसे पहलुओं पर विचार करती हैं। केवल पदनाम एक जैसा होना समान वेतन का आधार नहीं बन सकता।
संविधान में क्या है प्रावधान?
‘समान काम के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 39(डी) से जुड़ा है। इसमें राज्य को पुरुषों और महिलाओं के लिए समान काम पर समान वेतन सुनिश्चित करने की दिशा में नीति बनाने का निर्देश दिया गया है। हालांकि नीति निर्देशक सिद्धांत होने के कारण इसे सीधे मौलिक अधिकार की तरह लागू नहीं कराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में इस सिद्धांत को अनुच्छेद 14 और 16 से जोड़कर लागू करने योग्य माना है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 16 सरकारी रोजगार में अवसर की समानता से संबंधित है। यदि समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के बीच वेतन में अंतर का कोई तर्कसंगत और वैध आधार नहीं है, तो संवैधानिक समानता के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख फैसले
रणधीर सिंह बनाम भारत संघ (1982): अदालत ने समान काम के लिए समान वेतन को संवैधानिक लक्ष्य माना और उचित मामलों में इसे अनुच्छेद 14 और 16 के जरिए लागू करने की बात कही।
पंजाब राज्य बनाम जगजीत सिंह (2016): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उचित परिस्थितियों में अस्थायी कर्मचारी भी नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन का दावा कर सकते हैं, यदि दोनों वास्तव में समान कर्तव्य और जिम्मेदारियां निभा रहे हों।
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वेतन असमानता की चुनौतियां
कानूनी प्रावधानों के बावजूद वेतन में अंतर की समस्या बनी हुई है। खासकर महिलाओं के मामले में सामाजिक रूढ़ियां, कम वेतन वाले क्षेत्रों में अधिक भागीदारी, घरेलू काम का आर्थिक मूल्यांकन न होना और रोजगार के अवसरों में असमानता इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
इसके अलावा वेतन ढांचे में पारदर्शिता की कमी और नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन की चुनौती भी बनी हुई है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला यह स्पष्ट करता है कि समान वेतन के लिए केवल समान काम नहीं, बल्कि पद और नियुक्ति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं में वास्तविक समानता साबित करना भी जरूरी है।

