मप्र में सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) द्वारा जारी नई गाइडलाइन प्रशासनिक कार्यप्रणाली में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है। इसका मुख्य उद्देश्य कोर्ट की अवमानना जैसे गंभीर मामलों से मुख्य सचिव को बचाना और सरकारी पक्ष को अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना है। लेकिन यह पहल केवल एक सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही को सख्ती से लागू करने की दिशा में उठाया गया कदम भी है। निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि कोर्ट मामलों में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाने की प्रवृत्ति को समाप्त किया जाए, क्योंकि वे सीधे तौर पर किसी विभाग के संचालन के लिए उत्तरदायी नहीं होते। यह निर्णय प्रशासनिक संरचना की वास्तविकता को स्वीकार करता है और जिम्मेदारी को सही स्तर पर तय करने की कोशिश करता है। अब विभागीय सचिव और कलेक्टर पर यह दायित्व होगा कि वे समय रहते ऐसे मामलों में सुधार कराएं। इसके साथ ही, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए स्थायी अधिवक्ताओं की नियुक्ति पर जोर दिया है। यह कदम न्यायिक प्रक्रियाओं में पेशेवर दक्षता और निरंतरता सुनिश्चित करेगा। कानूनी जटिलताओं वाले मामलों में विशेषज्ञों की नियुक्ति की व्यवस्था भी प्रशासनिक गंभीरता को दर्शाती है। सबसे अहम पहलू यह है कि अब सरकारी नुकसान की स्थिति में संबंधित अफसर से वसूली का प्रावधान किया गया है। यह संदेश स्पष्ट है कि लापरवाही या देरी अब केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होगी। इससे प्रशासनिक तंत्र में सतर्कता और उत्तरदायित्व दोनों बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, इन निर्देशों की सफलता उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। केवल गाइडलाइन जारी करना पर्याप्त नहीं, बल्कि विभागीय स्तर पर निगरानी, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। निहितार्थ यह कि, यह सरकारी पहल सरकार की छवि सुधारने के साथ-साथ प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक ठोस प्रयास है। यदि इसे ईमानदारी से लागू किया गया, तो यह न केवल कोर्ट मामलों में सरकार की स्थिति मजबूत करेगा, बल्कि शासन प्रणाली में जवाबदेही की नई मिसाल भी कायम कर सकता है।
-मिलिंद ठाकरे

