पटना: चुनावी इतिहास में अपनी अनोखी पहचान बनाने वाले और ‘धरती पकड़’ के नाम से मशहूर नागरमल बाजोरिया का 97 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने पटना के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। भागलपुर के समाजसेवी बाजोरिया ने स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद तक के चुनावों में कुल 284 बार अपनी किस्मत आजमाई थी। हालांकि, उन्हें किसी भी चुनाव में जीत नहीं मिली।
इंदिरा गांधी से अटल बिहारी वाजपेयी तक से लिया मुकाबला
नागरमल बाजोरिया ने अपने लंबे चुनावी सफर के दौरान देश के कई बड़े नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ा। इनमें इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नाम शामिल हैं।
बताया जाता है कि उन्होंने अपना पहला चुनावी मुकाबला 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार वी.वी. गिरि के खिलाफ लड़ा था। इसके बाद उनका चुनाव लड़ने का सिलसिला लगातार जारी रहा।
284 बार चुनाव, लेकिन एक भी जीत नहीं
बाजोरिया ने वार्ड स्तर के स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव तक में उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल किया। उन्होंने कुल 284 बार चुनाव लड़ा, लेकिन हर बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
लगातार चुनाव लड़ने और कभी हार न मानने के जज्बे के कारण उन्हें लोगों ने ‘धरती पकड़’ नाम दिया। चुनावी मैदान में उनकी मौजूदगी कई बार बड़े नेताओं के मुकाबलों में भी चर्चा का विषय बनती रही।
यह भी पढ़े: SBI UPI Alert: आज रात 45 मिनट बंद रहेंगी यूपीआई सेवाएं, जानें किस समय नहीं कर पाएंगे लेनदेन
कहते थे- चुनाव हारता नहीं, जनता जीतती है
लगातार हार के बावजूद नागरमल बाजोरिया चुनाव लड़ने को लेकर अलग सोच रखते थे। उनका मानना था कि चुनाव लड़ने का मकसद सिर्फ जीत हासिल करना नहीं है। वह आम लोगों और मतदाताओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी के लिए प्रेरित करने की बात कहते थे।
उनका चुनावी सफर भारतीय लोकतंत्र में एक ऐसे उम्मीदवार की कहानी रहा, जिसने जीत की परवाह किए बिना दशकों तक चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
लाहौर से भागलपुर तक का सफर
नागरमल बाजोरिया मूल रूप से लाहौर के रहने वाले थे। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया और बाद में उन्होंने बिहार के भागलपुर को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। समाजसेवा के साथ-साथ उनका नाम लगातार चुनाव लड़ने के कारण देशभर में चर्चित हुआ।
97 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ भारतीय चुनावी इतिहास का एक अनोखा अध्याय भी समाप्त हो गया।

