किरनापुर/बालाघाट: सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नि:शुल्क 108 संजीवनी एक्सप्रेस का मकसद आपातकाल में मरीज की जान बचाना है, लेकिन बालाघाट जिले के किरनापुर में यह व्यवस्था ही दम तोड़ती नजर आ रही है। यहां 134 गांवों में करीब 2 लाख की आबादी रहती है, लेकिन इतनी बड़ी आबादी के लिए किरनापुर स्वास्थ्य केंद्र के पास मात्र 2 से 3 सरकारी एंबुलेंस ही उपलब्ध हैं। सवाल ये है कि क्या इतनी कम गाड़ियों से इतने बड़े ग्रामीण क्षेत्र में आपातकालीन सेवा चल पाएगी?
किसी गांव में सड़क हादसा हो जाए, गर्भवती महिला को तुरंत अस्पताल पहुंचाना हो या गंभीर मरीज को बालाघाट-नागपुर रेफर करना हो, सबसे पहले एंबुलेंस की जरूरत पड़ती है। लेकिन अगर एक गाड़ी पहले से किसी मरीज को लेकर गई हो, तो दूसरा मरीज भगवान भरोसे रह जाता है। परिजनों को मजबूरी में निजी वाहन या निजी एंबुलेंस तलाशनी पड़ती है।
हिना कावरे की भेंट की एंबुलेंस का क्या हुआ?
किरनापुर में एंबुलेंस की कमी कोई नई समस्या नहीं है। इसी जरूरत को देखते हुए पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष हिना कावरे ने कुछ वर्ष पहले स्वास्थ्य केंद्र को एक एंबुलेंस भेंट की थी। तब इसे जनता के लिए बड़ी सौगात माना गया था। उम्मीद थी कि दूर के गांवों के मरीजों को इससे राहत मिलेगी।
लेकिन हकीकत ये रही कि यह एंबुलेंस लंबे समय तक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में ही खड़ी रही। जिस गाड़ी को जिंदगी बचाने के लिए दिया गया था, वही गाड़ी बंद पड़ी रही और मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल सका।
लंबे समय बाद हुआ मेंटेनेंस, फिर भी सवाल बरकरार
जानकारी के अनुसार, लंबे समय तक बंद रहने के बाद लगभग एक महीने पहले ही इस एंबुलेंस का मेंटेनेंस कराया गया है। रोगी कल्याण समिति (RKS) की बैठक में इसके संचालन के लिए राशि भी तय की गई है। अब सवाल ये है? कि मेंटेनेंस के बाद भी क्या यह एंबुलेंस रोज मरीजों की सेवा में चल रही है? क्या इसके लिए चालक और जरूरी व्यवस्था हो गई है? अगर गाड़ी दुरुस्त है तो जनता को इसका लाभ कितनी बार मिल रहा है?
जनता के हित में दी गई गाड़ी का नियमित संचालन क्यों नहीं हो रहा, इसका जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना चाहिए। सरकारी संसाधन जनता की सुविधा के लिए होते हैं, अस्पताल में खड़े रखने के लिए नहीं।
एक एंबुलेंस रेफर पर गई तो 134 गांवों पर संकट
किरनापुर के कई गांव मुख्यालय से काफी दूर हैं। मान लीजिए किसी गंभीर मरीज को बालाघाट या नागपुर रेफर किया गया और एंबुलेंस उसे लेकर चली गई। उसी दौरान अगर किसी दूसरे गांव में हादसा हो जाए या प्रसूता को अस्पताल लाना हो, तो दूसरी एंबुलेंस कहां से आएगी?
ऐसी स्थिति में परिजनों के पास इंतजार करने या निजी वाहन तलाशने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। क्या स्वास्थ्य विभाग ने कभी आकलन किया कि एक समय में कितने मरीजों को एंबुलेंस की जरूरत पड़ सकती है?
निजी वाहनों पर बढ़ती निर्भरता, गरीबों पर बोझ
सरकारी एंबुलेंस न मिलने से क्षेत्र में निजी एंबुलेंस और निजी वाहनों पर निर्भरता बढ़ रही है। गरीब ग्रामीण परिवार के लिए यह दोहरी मार है। एक तरफ मरीज की जान पर बन आती है, दूसरी तरफ निजी वाहन का किराया जेब पर भारी पड़ता है।
आपातकाल में समय ही सबसे कीमती होता है। पहले वाहन ढूंढो, फिर किराया तय करो, तब मरीज अस्पताल पहुंचे – इसमें जो देरी होती है, वो जानलेवा हो सकती है।
अब विधायक राजकुमार कर्राहे से उम्मीद
पूर्व विधायक हिना कावरे की सौगात के बाद अब जनता की निगाहें वर्तमान विधायक राजकुमार कर्राहे पर टिकी हैं। लांजी-किरनापुर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अब वही कर रहे हैं। जनता जानना चाहती है कि क्या विधायक इस गंभीर समस्या को शासन और स्वास्थ्य विभाग के सामने उठाकर किरनापुर के लिए अतिरिक्त एंबुलेंस लाने की पहल करेंगे? क्या हिना कावरे वाली एंबुलेंस के नियमित संचालन को सुनिश्चित कराएंगे?
विकास के साथ स्वास्थ्य सुविधा भी उतनी ही जरूरी है। जनता को उम्मीद है कि विधायक स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन से चर्चा कर किरनापुर के लिए पर्याप्त एंबुलेंस की व्यवस्था कराएंगे।
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जनता का सवाल? कब सुधरेगी व्यवस्था?
ग्रामीणों की मांग है कि आबादी और गांवों की संख्या को देखते हुए तुरंत आकलन किया जाए और कम से कम 5 अतिरिक्त एंबुलेंस उपलब्ध कराई जाएं, ताकि एक मरीज के रेफर होने पर पूरे क्षेत्र की व्यवस्था न ठप हो। साथ ही हिना कावरे वाली एंबुलेंस के संचालन की स्थिति सार्वजनिक की जाए।
अब देखना होगा कि जिला कलेक्टर और CMHO इस पर क्या कदम उठाते हैं। क्योंकि एंबुलेंस सिर्फ एक वाहन नहीं, आपातकाल में किसी की जिंदगी बचाने की उम्मीद होती है। जब वही गाड़ी समय पर न मिले, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।

