भोपाल: विजयादशमी पर देशभर में रावण दहन की धूम है, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि पुतला फूंकने की यह व्यापक परंपरा सनातन शास्त्रों से नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मोड़ से उपजी है। आजाद भारत का पहला रावण दहन वर्ष 1948 में रांची में पाकिस्तान से आए विस्थापित शरणार्थियों द्वारा किया गया था। बन्नू शहर के परिवारों ने मात्र 30 रुपये की लागत से यह रीत शुरू की थी।
उज्जैन में आयोजकों को लीगल नोटिस, शास्त्रों में प्रमाण की मांग
इस वर्ष पुतला दहन को लेकर बड़ा विवाद उठा है। उज्जैन में महाकाल मंदिर से जुड़े पंडित महेश पुजारी ने शहर की चार प्रमुख दशहरा समितियों को लीगल नोटिस थमाकर शास्त्रों में रावण वध का शास्त्रीय प्रमाण मांगा है। उनका तर्क है कि रावण प्रकांड विद्वान और शिवभक्त था, इसलिए उसका पुतला जलाना बंद होना चाहिए।
MP में रावण-मेघनाद की महाआरती, लोक-आस्था में हैं देवता
इस बहस के बीच मध्यप्रदेश के कई अंचलों में लंकाधिपति को खलनायक नहीं, बल्कि ‘दामाद’, ‘बाबा’ या ‘ग्राम देवता’ मानकर पूजा जा रहा है।
विदिशा (रावण गांव) में ‘रावण बाबा महाराज’
यहाँ 10 फीट लंबी लेटी हुई परमार कालीन पाषाण प्रतिमा है। शादी, मुंडन का पहला कार्ड रावण बाबा को चढ़ाया जाता है। यहाँ दहन पूरी तरह वर्जित है।
पठारी और भाटखेड़ी में मेघनाद-कुंभकर्ण की पूजा
पठारी के पलीता गांव में पुत्र इंद्रजीत ‘मेघनाद बाबा’ के रूप में पूजे जाते हैं। राजगढ़ के भाटखेड़ी में 150 वर्षों से रावण-कुंभकर्ण को मन्नत पूरी करने वाले देव के रूप में पूजा होती है।
मंदसौर में ‘दामाद’ हैं रावण
मंदोदरी का मायका होने से नामदेव समाज रावण को दामाद मानता है। महिलाएं घूंघट काढ़कर आरती उतारती हैं।
मुरैना में आज भी आते हैं विभीषण
पहाड़गढ़ के ईश्वरा महादेव मंदिर में मान्यता है कि विभीषण हर रात अदृश्य रूप से शिवलिंग की पहली पूजा करने आते हैं।
छिंदवाड़ा-धार में पूर्वज हैं लंकेश
छिंदवाड़ा के अमरवाड़ा में गोंड समाज रावण को न्यायप्रिय पूर्वज मानकर महुए का भोग लगाता है, तो धार के कुक्षी में आदिवासी नई फसल अर्पित करते हैं।
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