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आसान परमिशन या अवैध निर्माण को खुली छूट?

मप्र सरकार ने शहरी क्षेत्रों में भवन निर्माण की अनुमति प्रक्रिया को आसान बनाने का बड़ा फैसला लिया है। कई विभागों से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है और पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया गया है। पहली नजर में यह फैसला आम नागरिकों को राहत देने वाला और प्रशासनिक सुधार की दिशा में सकारात्मक कदम कह सकते हैंं। वर्षों से लोग भवन अनुमति के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहे हैं, फाइलें अटकती रही हैं और भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में व्यवस्था का सरलीकरण निश्चित रूप से जरूरी था।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार ने अनुमति प्रक्रिया आसान करने के साथ निगरानी व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत बनाई है? यदि इसका जवाब ‘नहीं’ है, तो यह सुधार आने वाले समय में शहरों के लिए गंभीर संकट भी बन सकता है। मप्र के अधिकांश शहर पहले से ही अवैध निर्माण की समस्या से जूझ रहे हैं। नक्शे के विपरीत निर्माण, अतिरिक्त मंजिलें, पार्किंग की जगह पर व्यावसायिक उपयोग और मास्टर प्लान की खुली अनदेखी आम बात बन चुकी है। कई मामलों में कार्रवाई तब होती है, जब इमारतें पूरी तरह तैयार हो जाती हैं और फिर राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के कारण वे जस की तस खड़ी रहती हैं। ऐसे हालात में यदि एनओसी की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं नियमों की ढील को कुछ लोग अवैध निर्माण का लाइसेंस न समझ बैठें।

सरकार का दावा है कि अब संबंधित विभाग तय समय-सीमा में अपनी आपत्ति या सुझाव देंगे और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होगी। लेकिन क्या केवल ऑनलाइन आवेदन कर देने से पारदर्शिता आ जाएगी? यदि फील्ड में निरीक्षण कमजोर रहा, डिजिटल सिस्टम की निगरानी ढीली रही और नियम तोड़ने वालों पर त्वरित कार्रवाई नहीं हुई, तो यह पूरी व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएगी।

भवन निर्माण केवल किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति का मामला नहीं है। यह शहरों की सड़कें, यातायात, जल निकासी, अग्नि सुरक्षा, पर्यावरण और भविष्य की शहरी योजना से सीधे जुड़ा विषय है। आज की एक लापरवाही आने वाले वर्षों में हजारों नागरिकों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। देश के कई शहर अव्यवस्थित निर्माण और अतिक्रमण की भारी कीमत चुका रहे हैं। मध्यप्रदेश को वही गलती दोहराने से बचना होगा।

सरकार यदि वास्तव में सुधार चाहती है तो उसे ‘आसान परमिशन’ के साथ ‘जीरो टॉलरेंस ऑन अवैध कंस्ट्रक्शन’ की नीति भी लागू करनी होगी। ऑनलाइन व्यवस्था के साथ नियमित भौतिक निरीक्षण, जीआईएस आधारित निगरानी, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और नियम तोड़ने वालों पर तत्काल कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए। अन्यथा आज की राहत कल शहरों के लिए अभिशाप बन सकती है।

भवन अनुमति प्रक्रिया सरल होना समय की मांग है, लेकिन सरलता कभी भी नियमों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। यदि निगरानी कमजोर रही तो यह फैसला नागरिकों को सुविधा कम और अवैध निर्माण माफिया को अवसर अधिक देगा। सरकार के इस सुधार की वास्तविक सफलता परमिशन देने की गति से नहीं, बल्कि अवैध निर्माण रोकने की क्षमता से तय होगी। यही नई व्यवस्था की सबसे बड़ी और सबसे कठिन परीक्षा है।

-मिलिंद ठाकरे

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