तीन साइन बोर्ड की खरीदी पर 24.72 लाख रुपये खर्च! सप्लायर फर्मों के पते पर भी कारोबार का सुराग नहीं। मप्र के नगरीय निकायों में सरकारी खरीदी के ऐसे मामले सरकारी धन की निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। जनता की गाढ़ी कमाई लुटाने के लिए नहीं, जनहित के कामों पर खर्च करने के लिए है। लेकिन जब सरकारी खरीदी में कीमत से लेकर आपूर्ति तक पर सवाल उठने लगें, तो यह पूछना जरूरी हो जाता है कि सरकारी खजाने की रखवाली आखिर कौन कर रहा है? क्या खरीदी की फाइलों पर दर्ज आंकड़े ही भुगतान के लिए पर्याप्त हैं, या कोई यह भी सुनिश्चित करता है कि जिस सामान के नाम पर लाखों रुपये खर्च हुए, वह वास्तव में खरीदा और उपलब्ध कराया गया है? सरकारी धन खर्च करने वाले जिम्मेदार लोगों से यह हिसाब मांगना कोई औपचारिकता नहीं, जनता का अधिकार है। आखिर सरकारी खजाना किसी अधिकारी या ठेकेदार की निजी तिजोरी नहीं, बल्कि जनता की अमानत है।
डिंडोरी जिले की नगर परिषद शहपुरा से जुड़ा मामला इस आशंका को गंभीर बनाता है। पड़ताल में एक सप्लायर फर्म अपने दर्ज पते पर नहीं मिली, जबकि दूसरी फर्म की कार्यशाला में साइन बोर्ड बनाने से ही इनकार किया गया। यदि जांच में ये तथ्य सही साबित होते हैं, तो सरकारी खरीदी की प्रक्रिया और उसके सत्यापन तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। इसी तरह नगर परिषद खांड में तीन करोड़ रुपये की खरीदी में नियमों की अनदेखी की शिकायतें भी जांच की मांग करती हैं। टैंकर, इलेक्ट्रिक कचरा वाहन, सोलर पैनल और सफाई सामग्री की खरीदी में उठे सवालों का जवाब केवल फाइलों से नहीं, बल्कि वास्तविक आपूर्ति और भुगतान के सत्यापन से मिलना चाहिए। सरकारी खरीदी में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए जेम पोर्टल की व्यवस्था की गई है। इसका मकसद सरकारी संस्थाओं को उचित कीमत पर गुणवत्तापूर्ण सामग्री उपलब्ध कराना और अधिक से अधिक विक्रेताओं को अवसर देना है। लेकिन यदि निविदाओं की शर्तें इस तरह तय हों कि प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाए और गिनी-चुनी फर्मों को ही मौका मिले, तो इस व्यवस्था की उपयोगिता पर सवाल उठेंगे ही। किसी निविदा में एक ही बोली आना अपने आप में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है, लेकिन बार-बार ऐसी स्थिति बनने पर यह जांचना जरूरी है कि शर्तें वास्तविक जरूरतों के अनुरूप थीं या उनसे किसी खास फर्म को फायदा पहुंचने की आशंका थी।
सबसे बड़ा सवाल सरकारी तंत्र की जवाबदेही का है। किसी खरीदी में गड़बड़ी की शिकायत आती है तो जांच के आदेश दे दिए जाते हैं। कहीं अधिकारी का तबादला होता है, तो कहीं निलंबन की कार्रवाई। लेकिन क्या इससे जनता के पैसे की सुरक्षा सुनिश्चित हो जाती है? यदि महंगी खरीदी हुई, सामग्री की आपूर्ति नहीं हुई या भुगतान में अनियमितता सामने आई, तो जिम्मेदार कौन होगा? सरकारी धन के संभावित नुकसान की भरपाई कैसे होगी? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे, तब तक कार्रवाई की औपचारिकता से व्यवस्था में सुधार की उम्मीद करना बेमानी होगा। सरकार को संदिग्ध खरीदी के मामलों का स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट कराना चाहिए। सप्लायर फर्मों के पते और उनकी उत्पादन क्षमता की जांच हो। खरीदी गई सामग्री की वास्तविक उपलब्धता, बाजार दर, गुणवत्ता और भुगतान का मिलान किया जाए। यह भी देखा जाए कि निविदाओं की शर्तें प्रतिस्पर्धा के अनुकूल थीं या नहीं और खरीदी को मंजूरी देने से लेकर भुगतान करने तक किस स्तर पर क्या जिम्मेदारी निभाई गई। अनियमितता प्रमाणित होने पर संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और फर्मों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, जहां अनुचित भुगतान साबित हो, वहां नियमानुसार वसूली भी की जाए। सरकारी धन खर्च करने का अधिकार जिम्मेदारी से जुड़ा है, मनमानी से नहीं। नगरीय निकायों की खरीदी में पारदर्शिता सुनिश्चित करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इन संस्थाओं का सीधा संबंध आम नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरतों से है। जिस पैसे से शहरों की सफाई, पेयजल, रोशनी और बुनियादी सुविधाएं बेहतर होनी चाहिए, उसके इस्तेमाल पर ही सवाल उठने लगें तो स्थानीय प्रशासन पर जनता का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी खरीदी का हिसाब केवल कागजों पर पूरा न हो, बल्कि जमीन पर भी दिखाई दे। जनता जानना चाहती है कि उसके पैसे से क्या खरीदा गया, कितनी कीमत चुकाई गई और उसका वास्तविक लाभ कहां मिला। इन सवालों से बचने के बजाय सरकार को जांच और जवाबदेही के जरिए भरोसा कायम करना चाहिए। आखिर सरकारी खजाना जनता की अमानत है और उसकी रखवाली करना सत्ता में बैठे लोगों से लेकर संबंधित अधिकारियों तक, सभी का दायित्व है।
सवाल है सरकारी खरीदी पर सवाल उठ रहे हैं, तो जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?
-मिलिंद ठाकरे

