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संपादकीय: युवाओं का सड़क पर उतरना, व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी!

जब युवाओं का गुस्सा सड़कों पर उतरने लगे, तो इसे महज कानून-व्यवस्था की समस्या मानना सत्ता की सबसे बड़ी भूल हो सकती है। यह उस व्यवस्था के प्रति अविश्वास का संकेत है, जो बेहतर भविष्य के सपने तो दिखाती है, लेकिन उन्हें पूरा करने के अवसर नहीं दे पाती। यूरोप के छह देशों में उठता युवा असंतोष और भारत का जेनजी आंदोलन इसी संकट की ओर इशारा करते हैं। सवाल सिर्फ विरोध का नहीं, बल्कि उस बढ़ती निराशा का है, जो युवाओं को अपने ही भविष्य के प्रति आशंकित कर रही है। फ्रांस, इटली, स्पेन, ग्रीस, बेल्जियम और अल्बानिया में युवाओं का आक्रोश अलग-अलग मुद्दों पर सामने आया है। कहीं शिक्षा व्यवस्था और महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं, तो कहीं बेरोजगारी, महंगे किराये, आवास संकट और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठ रही है। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि अलग हो सकती है, लेकिन इनका साझा संदेश स्पष्ट है-युवा अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें अपने जीवन में बदलाव चाहिए।

भारत में भी बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक, महंगी शिक्षा और अवसरों की असमानता युवाओं की चिंता बढ़ा रही है। डिजिटल माध्यमों ने नई पीढ़ी को अपनी आवाज बुलंद करने और सामूहिक असंतोष जाहिर करने का मंच दिया है। हालांकि, भारत और यूरोप की परिस्थितियां अलग हैं, फिर भी दोनों जगह युवाओं की अपेक्षाओं और व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल महत्वपूर्ण है। विडंबना यह है कि सरकारें युवाओं को देश की सबसे बड़ी ताकत बताती हैं, लेकिन उनकी शिक्षा, रोजगार और आवास जैसी बुनियादी जरूरतें अक्सर नीतिगत प्राथमिकताओं में पीछे छूट जाती हैं। डिग्रियां बढ़ रही हैं, मगर योग्यता के अनुरूप रोजगार की तलाश कठिन बनी हुई है। भर्ती प्रक्रियाओं में अनिश्चितता और परीक्षाओं में गड़बड़ियां युवाओं की मेहनत तथा व्यवस्था पर भरोसे, दोनों को चोट पहुंचाती हैं। ऐसे में केवल नए वादे करना पर्याप्त नहीं; जरूरी है कि नीतियों का असर जमीन पर दिखाई दे। यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि असंतोष हिंसा का औचित्य नहीं बन सकता। आगजनी, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से किसी आंदोलन की वैधता मजबूत नहीं होती। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान और हिंसा पर निष्पक्ष कार्रवाई, दोनों आवश्यक हैं। लेकिन सरकारें यदि हर विरोध को केवल उपद्रव मानकर उसके पीछे के सवालों से बचेंगी, तो समस्या का समाधान और कठिन हो जाएगा।

शिक्षा पर पर्याप्त खर्च, पारदर्शी भर्ती, रोजगार के अवसर, किफायती आवास और भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सरकारों को घोषणाओं से आगे बढ़कर परिणाम देने होंगे। युवाओं की समस्याओं को समय रहते सुनना शासन की जिम्मेदारी है, न कि सड़कों पर आक्रोश फूटने के बाद की मजबूरी।
यूरोप में उठता युवा असंतोष भारत के लिए भी चेतावनी है। जिस पीढ़ी के कंधों पर विकास और प्रगति की जिम्मेदारी है, यदि वही अपने भविष्य को लेकर निराश हो जाए तो यह केवल युवाओं का संकट नहीं, पूरी व्यवस्था की विफलता का संकेत है। युवाओं की आवाज दबाकर सत्ता कुछ समय के लिए शांति कायम कर सकती है, लेकिन उनका असंतोष खत्म नहीं कर सकती। भविष्य के सपने दिखाना आसान है, उन्हें सच करने के अवसर देना असली कसौटी है। सरकारों को समझना होगा कि युवाओं के सवालों की अनदेखी अंततः लोकतंत्र में उनके भरोसे को कमजोर करती है। युवा शक्ति को राष्ट्र की ताकत बनाए रखना है तो उसके भविष्य को सुरक्षित करना होगा-क्योंकि निराश युवा केवल सरकारों के लिए चुनौती नहीं, देश की प्रगति के लिए भी खतरे की घंटी है।

-मिलिंद ठाकरे

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