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विदेश से चीनी मंगाने की नौबत, MP की मिलें बंद: कर्ज, कुप्रबंधन और गन्ने की कमी से बिगड़ी हालत

मुरैना: देश में चीनी की कीमतें बढ़ने के बीच केंद्र सरकार ने बाजार में सप्लाई बनाए रखने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी ड्यूटी-फ्री आयात करने का फैसला किया है। दूसरी ओर मध्य प्रदेश की छह बड़ी चीनी मिलें वर्षों से बंद पड़ी हैं। कहीं करोड़ों का कर्ज है, तो कहीं मशीनरी और जमीन विवादों में हैं। इसका असर किसानों, कर्मचारियों और स्थानीय कारोबार पर पड़ा है।

15 साल से बंद मिल शुरू कराने की मांग

मुरैना की कैलारस शुगर मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग ने बंद मिलों का मुद्दा फिर गरमा दिया है। करीब 15 साल से बंद मिल के लिए कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय ने आमरण अनशन किया। सरकार के आश्वासन के बाद अनशन खत्म हुआ, लेकिन किसानों और कर्मचारियों में नाराजगी कायम है। उनका कहना है कि 2017 के बाद मिल शुरू करने के दो प्रयास कागजी कार्रवाई से आगे नहीं बढ़ सके।

MP की 6 चीनी मिलें बंद, हर मिल की कहानी में अलग संकट

  • भोपाल शुगर इंडस्ट्रीज, सीहोर 1937 में शुरू हुई और 1,250 TCD क्षमता वाली थी।प्रबंधन-मजदूर विवाद के बाद मिल 2002-03 में बंद हो गई। मिल के पास 4,365 एकड़ से अधिक जमीन बताई जाती है।कर्मचारियों के ₹107 करोड़ से ज्यादा वेतन और PF बकाया का दावा है।
  • डबरा शुगर मिल, ग्वालियर 1940 में सिंधिया रियासत के दौरान शुरू हुई। किसानों को समय पर भुगतान नहीं मिलने से उन्होंने गन्ने की खेती घटा दी। कच्चे माल की कमी और वित्तीय संकट के चलते मिल बंद हो गई।
  • मालवा सहकारी शक्कर कारखाना, बरलाई 1980 में करीब 10 हजार किसानों ने बनाया। 2001 के सूखे से गन्ना उत्पादन घटा और कुप्रबंधन से कर्ज बढ़ा। मिल 2002-03 में बंद हुई और करीब ₹165 करोड़ सरकारी कर्ज बताया जाता है।
  • नारायणपुरा शक्कर मिल, गुना 2000 में सहकारी मॉडल पर शुरू हुई। बैंक कर्ज और ब्याज बढ़ने से भुगतान संकट आया। किसानों ने गन्ने की खेती छोड़ दी और मिल 2017-18 में बंद हो गई। जुलाई 2026 में इसके पुनरुद्धार के लिए तकनीकी निरीक्षण किया गया।

क्या MP की बंद मिलों से महंगी हुई चीनी?

विशेषज्ञों के अनुसार MP की बंद मिलें देश में चीनी महंगी होने की सीधी वजह नहीं हैं। कीमतों पर मौसम, गन्ने का उत्पादन, शुगर रिकवरी, निर्यात और त्योहारों की मांग का असर है। अत्यधिक बारिश से रिकवरी 12% से नीचे आने पर उत्पादन प्रभावित हुआ। एथेनॉल डायवर्जन ने भी उपलब्धता पर असर डाला, हालांकि सरकार के मुताबिक इसका हिस्सा 2022-23 के 12% से घटकर 2025-26 में करीब 9% रह गया।

नवंबर 2025 और फरवरी 2026 में 20 लाख टन निर्यात की अनुमति दी गई, जिसमें मई तक करीब 8 लाख टन चीनी निर्यात हुई। त्योहारों की बढ़ी मांग और जमाखोरी ने भी कीमतों पर दबाव बढ़ाया।

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