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भारत-अमेरिका ट्रेड डील से लेकर समान नागरिक संहिता तक RSS प्रमुख ने कई मुद्दों पर रखी बेबाक राय

मुंबई। आयोजित एक व्याख्यानमाला के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश और दुनिया से जुड़े कई अहम विषयों पर खुलकर अपनी बात रखी। भागवत ने कहा कि संघ विविधता का विरोधी नहीं है। लेकिन यदि समान नियमों से देश की एकता मजबूत होती है, तो उसका समर्थन किया जाना चाहिए बशर्ते समाज में टकराव की स्थिति न बने। वर्तमान केंद्र सरकार ऐसी सरकार है जो दबाव में नहीं आती, बल्कि दृढ़ता के साथ निर्णय लेने की क्षमता रखती है।

India-US Trade Deal पर संतुलित टिप्पणी

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर चल रही सियासी बहस के बीच मोहन भागवत ने कहा कि आज के वैश्विक दौर में कोई भी देश खुद को अलग-थलग नहीं रख सकता। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों में लेन-देन दोनों पक्षों से होता है, अहम यह है कि देश के हितों की रक्षा हो। उन्होंने भरोसा जताया कि मौजूदा प्रशासन इस संतुलन को समझता है और बीते दस वर्षों का शासन इसका प्रमाण है।

हर नई चीज़ को आंख मूंदकर अपनाना ठीक नहीं

संघ प्रमुख ने कहा कि दुनिया से ज्ञान लेना चाहिए, लेकिन उसे अपनी परंपरा, सामाजिक ढांचे और किसानों के हितों की कसौटी पर परखना जरूरी है। केवल “नया है” इसलिए उसे स्वीकार कर लेना विवेकपूर्ण नहीं माना जा सकता। अपने संबोधन में उन्होंने जीवन प्रबंधन पर भी विचार साझा किए। मोहन भागवत ने कहा कि आय को छह भागों में बांटने की सोच भारतीय जीवन पद्धति का हिस्सा है—

  • स्वयं के लिए
  • परिवार के लिए
  • ईश्वर के लिए
  • आपातकालीन बचत
  • समाज और धर्म के लिए
  • तथा शासन के लिए

सनातन परंपरा और धर्म की अवधारणा

उन्होंने कहा कि बुद्ध ने भी अपने मार्ग को सनातन परंपरा से जुड़ा बताया था। संघ प्रमुख के अनुसार, सनातन परंपरा की दो प्रमुख धाराएं वैदिक और बौद्ध रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य मतों को समझाने से पहले संवाद और मैत्री आवश्यक है। मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ किसी पार्टी पर दबाव नहीं बनाता। राजनीति पर मतदाताओं का प्रभाव होता है, न कि संघ का। जो राजनीतिक दल संघ की विचारधारा को अपनाते हैं, उन्हें जनता का समर्थन मिलता है, यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। RSS प्रमुख ने कहा कि समान नागरिक संहिता का विचार सकारात्मक है। उन्होंने उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पहले सुझाव मांगे गए, लाखों लोगों की राय ली गई और उसके बाद कानून बनाया गया। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कानून बनाना पर्याप्त नहीं, उसका पालन सुनिश्चित होना भी उतना ही जरूरी है।

शिक्षा, पर्यावरण और युवा पीढ़ी पर फोकस

वहीं संघ प्रमुख ने कहा कि- समाज निर्माण केवल संघ की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास है। पर्यावरण संरक्षण हर नागरिक का दायित्व है। संघ एक युवा संगठन है, जहां नई पीढ़ी को आगे लाने की परंपरा है। मातृभाषा में शिक्षा और संस्कृत के प्रयोग पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि संघ को धारणाओं या प्रचार के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुभव से समझा जाना चाहिए। उन्होंने नागरिकों से अपनी पहचान, संस्कृति और देश को लेकर स्पष्ट सोच के साथ सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

 

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