नई दिल्ली: रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत और चीन जैसे देशों पर लगातार दबाव बनाने वाले अमेरिका की नीति पर अब सवाल उठ रहे हैं? एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस से ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दे रहे हैं,तो वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के खुद रूस से बड़ी मात्रा में डीजल खरीदने के दावे सामने आए हैं। हालांकि, इस कथित समझौते की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
रूस से डीजल खरीदने की चर्चा क्यों?
सामने आई जानकारी के अनुसार, अमेरिका और रूस के बीच बड़े पैमाने पर डीजल की खरीद को लेकर समझौता होने का दावा किया जा रहा है। इसमें करीब 48 लाख टन डीजल की संभावित खरीद की बात कही गई है। दावा है कि शुरुआती चरण में 3 लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति हो सकती है, जबकि नवंबर में 5 लाख टन डीजल भेजे जाने की योजना है।
अगर यह समझौता सही साबित होता है, तो अमेरिका की रूस को लेकर अपनाई गई नीति पर कई सवाल खड़े हो सकते हैं।
भारत पर दबाव, लेकिन अपने हित पहले?
भारत लंबे समय से अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है। अमेरिका इस कारोबार पर कई बार आपत्ति जता चुका है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी भी चर्चा में रही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और आम लोगों को महंगाई से राहत देने के लिए रूस से तेल खरीदता है, तो उस पर दबाव क्यों बनाया जाता है? और अगर अमेरिका खुद ऐसा कारोबार करता है, तो उसके लिए नियम अलग क्यों होने चाहिए?
अमेरिका में बढ़ती महंगाई बनी परेशानी
अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमतों को भी इस कथित फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है। रिपोर्ट में डीजल की कीमत 6.28 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंचने का दावा किया गया है। हालांकि, इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
डीजल महंगा होने से अमेरिका में माल ढुलाई, खेती और छोटे कारोबार की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ता है।
नवंबर 2026 में होने वाले मध्यावधि चुनावों को देखते हुए महंगाई ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। ऐसे में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।
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क्या अमेरिका की नीति में होगा बदलाव?
रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका का रुख पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रहा है। अब डीजल खरीद के नए दावों ने इस बहस को और बढ़ा दिया है।
हालांकि, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि अमेरिका और रूस के बीच वास्तव में कोई नया समझौता हुआ है या नहीं।

