नई दिल्ली: देश में महंगाई का दबाव बढ़ता जा रहा है। जून में थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 9.87% पर पहुंच गई है। यह पिछले 44 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले सितंबर 2022 में थोक महंगाई 10.70% रही थी। वाणिज्य मंत्रालय ने 14 जुलाई को इसके आंकड़े जारी किए।
महंगाई बढ़ने की मुख्य वजह रोजमर्रा की जरूरतों के सामान और खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी बताई जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर अंतरराष्ट्रीय तनाव और कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव जारी रहा तो आने वाले समय में कीमतें और बढ़ सकती हैं।
खाने-पीने की चीजें हुईं महंगी
जून में रोजाना इस्तेमाल होने वाले सामानों की थोक महंगाई दर 4.99% से बढ़कर 7% हो गई थी। वहीं, खाद्य पदार्थों की महंगाई 4.49% से बढ़कर 6.14% पर पहुंच गई।
• प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई: 7%
• फूड इंडेक्स महंगाई: 6.14%
• फ्यूल और पावर महंगाई: 27.41%
• मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स महंगाई: 7.48%
• थोक महंगाई के तीन बड़े हिस्से
WPI में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की होती है।
• मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स: 64.23%
• प्राइमरी आर्टिकल्स: 22.62%
• फ्यूल और पावर: 13.15%
प्राइमरी आर्टिकल्स में खाद्य पदार्थ, गैर-खाद्य वस्तुएं, खनिज और कच्चा तेल शामिल होते हैं।
आम आदमी पर क्या असर?
थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहने पर इसका असर उत्पादन लागत पर पड़ता है। कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं, जिससे रोजमर्रा के सामान महंगे हो सकते हैं। सरकार महंगाई को नियंत्रित करने के लिए टैक्स में बदलाव और ईंधन पर राहत जैसे कदम उठा सकती है, लेकिन इसकी भी एक सीमा होती है।
रिटेल महंगाई भी बढ़ी
इससे पहले जारी खुदरा महंगाई (CPI) के आंकड़ों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। जून में रिटेल महंगाई बढ़कर 4.38% पहुंच गई, जबकि मई में यह 3.93% थी। जनवरी में यह 2.74% पर थी।
WPI और CPI में अंतर
थोक महंगाई (WPI) उन कीमतों को मापती है, जिन पर कारोबारी थोक बाजार में सामान खरीदते-बेचते हैं। वहीं, खुदरा महंगाई (CPI) आम ग्राहकों द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों को दर्शाती है।
महंगाई के इन दोनों आंकड़ों से देश की आर्थिक स्थिति और बाजार में कीमतों के दबाव का अंदाजा लगाया जाता है|

