इंदौर: देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिने जाने वाले इंदौर में अब पीने के पानी की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। भागीरथपुरा में सामने आए घटनाक्रम के बाद पुराने जल परीक्षण रिकॉर्ड चर्चा में हैं। इनसे संकेत मिलता है कि शहर में दूषित भूजल की समस्या नई नहीं थी, बल्कि इसकी चेतावनी कई साल पहले मिल चुकी थी।
सात साल पुरानी रिपोर्ट अब क्यों बनी अहम?
साल 2019 में शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद ट्यूबवेल और हैंडपंप के पानी की जांच की गई थी। बताया जा रहा है कि इनमें करीब 60 जलस्रोतों के नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे थे।
अब सवाल यह उठ रहा है कि ऐसी रिपोर्ट सामने आने के बाद संबंधित जलस्रोतों को लेकर क्या कार्रवाई की गई? यदि पानी इस्तेमाल के योग्य नहीं था तो लोगों को इसकी जानकारी कैसे दी गई और वैकल्पिक पेयजल व्यवस्था कितनी प्रभावी रही?
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भागीरथपुरा की घटना ने फिर खोली पुरानी फाइल
भागीरथपुरा में दूषित पानी से जुड़े 36 मौतों की बात सामने आने के बाद पुराने रिकॉर्ड की अहमियत बढ़ गई है। मामला अब केवल एक इलाके की पेयजल समस्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शहर की पूरी Water Monitoring System पर सवाल खड़े कर रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक भूजल की एक बार जांच कर लेना पर्याप्त नहीं होता। समय-समय पर Sampling, पाइपलाइन की निगरानी और दूषित स्रोत मिलने पर तत्काल रोक जरूरी होती है।
स्वच्छता के साथ सुरक्षित पानी भी चुनौती
इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में अपनी अलग पहचान बनाई है। ऐसे में पेयजल से जुड़ा यह मामला शहर के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। अब निगाह इस बात पर है कि पुराने रिकॉर्ड के आधार पर जिम्मेदारी तय होती है या नहीं और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन क्या स्थायी व्यवस्था करता है।

