देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी 2026 आखिरकार रद्द कर दी गई। लाखों छात्रों की मेहनत, परिवारों की उम्मीदें और पूरे शिक्षा तंत्र की साख एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस बार खुद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने गड़बड़ी की जिम्मेदारी स्वीकार की है। यह स्वीकारोक्ति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं। यह विफलता उस व्यवस्था की भी पोल खोलती है जो वर्षों से पारदर्शी परीक्षा के दावे करती रही। 22 लाख से ज्यादा छात्रों ने परीक्षा दी थी। इनमें अधिकांश ऐसे विद्यार्थी हैं जिन्होंने दिन-रात मेहनत कर डॉक्टर बनने का सपना देखा। लेकिन कुछ लोगों ने कथित प्रश्न बैंक के जरिए पूरे सिस्टम को मजाक बना दिया। 300 से अधिक सवालों में से 150 सवाल हूबहू परीक्षा में आना केवल संयोग नहीं हो सकता। यह संगठित अपराध, तकनीकी कमजोरी और संस्थागत लापरवाही का खतरनाक मिश्रण है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक पीड़ा ईमानदार छात्रों को हुई है। जिन्होंने सालों तैयारी की, वे अब दोबारा परीक्षा के मानसिक दबाव से गुजरेंगे। दूसरी ओर, शिक्षा मंत्री का सवालों से बचना सरकार की जवाबदेही पर भी प्रश्न खड़े करता है। जब देश का युवा जवाब मांग रहा हो, तब चुप्पी भरोसे को और कमजोर करती है। पेपर लीक का नेटवर्क केरल से राजस्थान और महाराष्ट्र तक फैलना दिखाता है कि परीक्षा माफिया अब स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं। कोचिंग संस्थानों, परामर्श एजेंसियों और डिजिटल माध्यमों के जरिए यह समानांतर भ्रष्ट तंत्र तैयार हो चुका है। यदि समय रहते इसे नहीं रोका गया, तो प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो सकती है। अब केवल परीक्षा दोबारा कराने से काम नहीं चलेगा। जरूरत है कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र जांच हो, डिजिटल सुरक्षा मजबूत की जाए और दोषियों को ऐसी सजा मिले जो भविष्य के लिए उदाहरण बने। क्योंकि यह सिर्फ एक पेपर लीक नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों में सेंध है।
-मिलिंद ठाकरे

