देश इस समय वैश्विक अस्थिरता और आर्थिक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। इजराइल-ईरान युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से डीजल-पेट्रोल का संयमित उपयोग करने, गैरजरूरी विदेश यात्राएं टालने और एक साल तक सोने की खरीदारी से बचने की अपील निश्चित रूप से जिम्मेदार नागरिक व्यवहार का संदेश देती है। प्रधानमंत्री का यह आग्रह केवल आर्थिक बचत तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की सोच को भी सामने लाता है। लेकिन सवाल तब खड़े होते हैं, जब सत्ता और संगठन से जुड़े लोग ही इस संदेश की गंभीरता को नजरअंदाज करते दिखाई दें। मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम के नए अध्यक्ष सौभाग्य सिंह ठाकुर का उज्जैन से भोपाल तक दो सौ से अधिक गाड़ियों के काफिले के साथ पहुंचना इसी विरोधाभास को उजागर करता है। एक ओर देशवासियों से ईंधन बचाने और सादगी अपनाने की अपील की जा रही है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के लिए सैकड़ों वाहनों का उपयोग किया जा रहा है। इससे न केवल भारी मात्रा में ईंधन की खपत हुई, बल्कि हाईवे से लेकर भोपाल शहर तक लंबा जाम भी लगा, जिससे आम नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। भीषण गर्मी में घंटों जाम में फंसे बच्चे, बुजुर्ग और मरीज शायद यही सोच रहे होंगे कि क्या संयम और सादगी केवल आम जनता के लिए ही है? लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल भाषण देने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उन्हें अपने आचरण से उदाहरण भी प्रस्तुत करना होता है। राजनीति में स्वागत और शक्ति प्रदर्शन की परंपरा नई नहीं है, लेकिन बदलते आर्थिक और वैश्विक हालात में अब दिखावे की राजनीति पर पुनर्विचार की जरूरत है। यदि नेता स्वयं प्रधानमंत्री की अपील का पालन करते दिखाई देंगे, तभी जनता भी उस संदेश को गंभीरता से लेगी। वरना पीएम मोदी की संयम की अपील और सड़कों पर दौड़ते लंबे काफिले, दोनों मिलकर केवल एक विरोधाभासी तस्वीर ही पेश करेंगे।
-मिलिंद ठाकरे

