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इस्तीफे की मांग से नहीं, सुशासन के मॉडल से जीता जाता है जनता का विश्वास

नई दिल्ली: 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में INDIA गठबंधन के नेताओं और समर्थकों का जुटना भारतीय राजनीति की मौजूदा दिशा को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष ने ‘चलो दिल्ली’ और ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन किया। इस रैली में विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई।

लोकतंत्र में विरोध करना विपक्ष का अधिकार है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, किसी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित किया गया है या पुनरीक्षण की प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। चुनाव आयोग को भी प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न खड़ा होता है क्या मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करने से चुनाव व्यवस्था सुधर जाएगी ? क्या किसी संवैधानिक पदाधिकारी के पद छोड़ने से कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के प्रति जनता का विश्वास वापस लौट आएगा ?

मेरा स्पष्ट मानना है कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को पद से हटाने की मांग करना और जनता के मन में अपनी जगह बनाना दो अलग-अलग विषय हैं। राजनीतिक विश्वसनीयता आंदोलन की भीड़ से नहीं, बल्कि नेतृत्व की क्षमता, शासन के प्रदर्शन और जनता के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने से स्थापित होती है।

1. चुनाव आयोग पर सवाल जरूरी, लेकिन समाधान भी बताना होगा

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 97.98 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। इनमें से लगभग 64.64 करोड़ लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। देशभर में 10.52 लाख से अधिक मतदान केंद्र बनाए गए थे।

ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में चुनाव कराना कितना व्यापक और जटिल प्रशासनिक कार्य है। इतनी बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाए रखना केवल चुनाव आयोग ही नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

SIR का मूल उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, मृतक और स्थानांतरित मतदाताओं के नामों की पहचान करना तथा पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना है। लेकिन इस प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि किसी वास्तविक और पात्र भारतीय नागरिक का नाम गलती से न हटे।

बिहार में 2025 के SIR के दौरान प्रारंभिक सूची में लगभग 65 लाख नाम शामिल नहीं हो पाए थे। बाद में प्रकाशित अंतिम सूची में लगभग 7.42 करोड़ मतदाता दर्ज हुए। इस प्रक्रिया को लेकर न्यायालय में चुनौती दी गई। 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में आयोजित SIR की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाताओं के दावे, आपत्तियां और अपील के अधिकार महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए इस विषय पर बहस करते समय दोनों पक्षों को तथ्यों के साथ बात करनी चाहिए। SIR को लेकर उठने वाली हर आपत्ति को राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता और न ही हर मतदाता सूची संशोधन को लोकतंत्र पर हमला बताया जा सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान है। यह प्रावधान इस पद की स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा की रक्षा के लिए बनाया गया है।
विपक्ष को यदि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति है, तो उसे प्रमाण, संवैधानिक प्रक्रिया और ठोस सुधारों के प्रस्ताव के साथ सामने आना चाहिए।

लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता किसी एक राजनीतिक दल की सुविधा के अनुसार नहीं, बल्कि संविधान और निष्पक्षता के आधार पर तय होनी चाहिए।

2. चुनावी आंकड़े बताते हैं कि विपक्ष के सामने चुनौती केवल सत्ता की नहीं, विश्वसनीयता की भी है

2024 के लोकसभा चुनाव के परिणामों का विश्लेषण करें तो भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। भाजपा ने 240 लोकसभा सीटें प्राप्त कीं, जबकि कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं। INDIA गठबंधन ने सामूहिक रूप से 233 सीटें हासिल कीं। इसका अर्थ यह है कि विपक्ष ने संसद में अपनी स्थिति पहले की तुलना में मजबूत की, लेकिन केंद्र में सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास रहा।
इन आंकड़ों से दो महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं।

पहली, भारतीय मतदाता किसी एक राजनीतिक दल के प्रति स्थायी रूप से बंधा हुआ नहीं है। वह परिस्थितियों, स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवारों और मुद्दों के आधार पर अपना निर्णय बदल सकता है।

दूसरी, विपक्ष के पास आज भी एक बड़ा राजनीतिक आधार मौजूद है। लेकिन इस आधार को स्थायी जनविश्वास में बदलने के लिए केवल गठबंधन और चुनावी रणनीति पर्याप्त नहीं होगी।

कांग्रेस को यह समझना होगा कि देश की जनता केवल यह नहीं जानना चाहती कि भाजपा ने क्या किया। वह यह भी जानना चाहती है कि कांग्रेस सत्ता में आने पर क्या अलग और बेहतर करेगी।

यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी विकल्प बनना है, तो उन्हें अपनी राजनीतिक ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा शासन के बेहतर उदाहरण स्थापित करने में लगाना होगा।

3. भाजपा की राजनीतिक यात्रा : गुजरात मॉडल से राष्ट्रीय नेतृत्व तक

भारतीय राजनीति में भाजपा की यात्रा का विश्लेषण विपक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है।
एक समय ऐसा था जब भाजपा केंद्र में सत्ता में नहीं थी और कांग्रेस देश की प्रमुख सत्ताधारी पार्टी थी। उस दौर में भाजपा ने केवल केंद्र सरकार का विरोध करने तक अपनी राजनीति सीमित नहीं रखी। उसने अपने शासन वाले राज्यों में विकास और प्रशासन के अलग-अलग मॉडल प्रस्तुत करने की कोशिश की।

इस संदर्भ में गुजरात का उदाहरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में गुजरात को औद्योगिक निवेश, सड़क, बिजली, आधारभूत संरचना और प्रशासनिक सुधारों के संदर्भ में एक विशिष्ट पहचान दिलाने का प्रयास किया गया। गुजरात मॉडल को राष्ट्रीय राजनीति में विकास आधारित नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इसके बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने इसी विकास आधारित राजनीतिक संदेश को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार दिया। यह कहना उचित नहीं होगा कि गुजरात या भाजपा शासित सभी राज्यों में हर समस्या का समाधान हो गया था। किसी भी राज्य की उपलब्धियों का मूल्यांकन रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, निवेश, सामाजिक विकास और आर्थिक आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए।

लेकिन यहां राजनीतिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू समझने की आवश्यकता है। भाजपा ने अपने शासन वाले राज्यों के अनुभव को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। उसने यह संदेश देने का प्रयास किया कि वह केवल सत्ता का विकल्प नहीं, बल्कि शासन का एक अलग मॉडल भी प्रस्तुत कर सकती है। यही वह राजनीतिक रणनीति है, जिससे कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को भी सीखने की जरूरत है।

4. कांग्रेस के पास भी अवसर है : अपने राज्यों को विकास का मॉडल बनाइए

आज देश की राजनीतिक परिस्थिति पहले जैसी नहीं है। केंद्र में भाजपा की सरकार है, लेकिन कई राज्यों में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की सरकारें भी काम कर रही हैं। यह उनके लिए एक बड़ा अवसर है।
यदि किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हासिल करनी है, तो उसे अपने शासन वाले राज्यों में ऐसी उपलब्धियां स्थापित करनी चाहिए, जिनकी चर्चा दूसरे राज्यों में भी हो।

कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारें यह संकल्प लें कि उनके राज्य शिक्षा के क्षेत्र में देश के लिए उदाहरण बनेंगे। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता, डिजिटल शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आधुनिक संसाधनों पर काम किया जाए। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी अस्पतालों को आधुनिक बनाया जाए। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर किया जाए। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।

रोजगार के क्षेत्र में केवल सरकारी नौकरियों की घोषणाएं करने के बजाय औद्योगिक निवेश, कौशल विकास, स्टार्टअप और निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं। महिलाओं की सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए। किसानों के लिए आधुनिक कृषि तकनीक, सिंचाई, भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण और बेहतर बाजार व्यवस्था विकसित की जाए। शहरी क्षेत्रों में ट्रैफिक प्रबंधन, स्वच्छता, सार्वजनिक परिवहन, जल प्रबंधन और डिजिटल नागरिक सेवाओं को बेहतर बनाया जाए।

यदि किसी राज्य में कांग्रेस की सरकार यह दिखा देती है कि उसने पांच वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रशासन के क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन किया है, तो वही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि बन सकती है।
राजनीति में सबसे प्रभावशाली प्रचार वह होता है, जिसे जनता अपने जीवन में महसूस करती है।

5. विकास के आंकड़ों से भी तय होती है राजनीतिक विश्वसनीयता

नीति आयोग के SDG इंडिया इंडेक्स 2023-24 के आंकड़े भारत के राज्यों के विकास की दिशा समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत का समग्र स्कोर 2020-21 के 66 से बढ़कर 2023-24 में 71 हो गया।
इसी रिपोर्ट में उत्तराखंड और केरल 79 अंकों के साथ राज्यों में शीर्ष स्थान पर रहे। वहीं उत्तर प्रदेश ने 2018 से 2023-24 के बीच अपने स्कोर में 25 अंकों का सुधार दर्ज किया, जो राज्यों में सबसे अधिक सुधारों में शामिल है।
मध्य प्रदेश और ओडिशा ने भी इसी अवधि में 15-15 अंकों का सुधार दर्ज किया।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी कि विकास किसी एक राजनीतिक दल की बपौती नहीं है। जिस राज्य में जिस दल की सरकार है, वहां उसे अपने काम का परिणाम देना होगा।

यदि विपक्षी दल यह दावा करते हैं कि उनकी नीतियां बेहतर हैं, तो उन्हें अपने शासन वाले राज्यों में इनका प्रमाण देना चाहिए। उन्हें अपने राज्यों का ऐसा विकास रिपोर्ट कार्ड जारी करना चाहिए, जिसमें रोजगार, प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, औद्योगिक निवेश, सड़क, बिजली और ग्रामीण विकास के मापने योग्य परिणाम हों।
जनता को यह बताना चाहिए कि पिछले पांच वर्षों में कितने नए उद्योग आए, कितने रोजगार पैदा हुए, सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की उपस्थिति कितनी बढ़ी, अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता कितनी सुधरी और कितने गांवों को बेहतर बुनियादी सुविधाएं मिलीं।ऐसा करने से राजनीतिक बहस आरोपों से निकलकर परिणामों पर केंद्रित होगी।

6. डिजिटल युग में आंदोलन के साथ डिजिटल गवर्नेंस भी जरूरी

आज भारत की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन आ चुका है। आंदोलन अब केवल सड़कों और मैदानों तक सीमित नहीं हैं। वे डिजिटल और भौतिक, दोनों माध्यमों से संचालित होते हैं। रामलीला मैदान में जुटी भीड़ का संदेश कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया के माध्यम से देश के करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है।

आज मोबाइल फोन रखने वाला सामान्य नागरिक भी किसी राजनीतिक रैली को लाइव देख सकता है। वह नेताओं के भाषणों की तुलना कर सकता है, सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकता है और अपने अनुभव सार्वजनिक कर सकता है। ऐसे समय में राजनीतिक दलों को केवल डिजिटल प्रचार नहीं, बल्कि डिजिटल गवर्नेंस पर भी ध्यान देना होगा।

सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाए। शिकायतों के समाधान की समय-सीमा निर्धारित हो। नागरिकों को अपनी शिकायत की स्थिति डिजिटल माध्यम से देखने की सुविधा मिले। सरकारी योजनाओं का लाभ बिना बिचौलियों के पात्र व्यक्ति तक पहुंचे।

विपक्षी सरकारें अपने राज्यों में तकनीक आधारित प्रशासन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर सकती हैं, जिससे देश के दूसरे राज्य भी सीख सकें। किसी रैली में लाखों लोगों को जुटाने से अधिक महत्वपूर्ण यह साबित करना है कि आपकी सरकार लाखों नागरिकों की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम है।

7. हिंदुत्व, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता को समझना होगा

भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष देश की सांस्कृतिक चेतना और धार्मिक विरासत भी है। भारत हिंदू बहुसंख्यक समाज वाला देश है। यहां की सभ्यता, संस्कृति, परंपराएं, तीर्थस्थल, धार्मिक आयोजन और सामाजिक जीवन सदियों पुरानी सांस्कृतिक निरंतरता से जुड़े हुए हैं।इस वास्तविकता को समझना किसी भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के लिए आवश्यक है। हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान को नजरअंदाज करके व्यापक राष्ट्रीय जनसमर्थन हासिल करना कठिन हो सकता है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भारत की विविधता और दूसरे धर्मों के नागरिकों के अधिकारों की उपेक्षा की जाए। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। एक परिपक्व राजनीतिक दल वह होगा, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करे, बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को समझे और साथ ही सभी समुदायों के लिए समान अवसर, सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करे।

विपक्ष को यह समझना होगा कि सांस्कृतिक पहचान और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। भारत की परंपराओं के प्रति सम्मान रखते हुए आधुनिक विज्ञान, तकनीक, उद्योग और शिक्षा में भी आगे बढ़ा जा सकता है।
आज का मतदाता ऐसा नेतृत्व चाहता है, जो भारत की जड़ों से जुड़ा हो और भविष्य की चुनौतियों के लिए भी तैयार हो।

8. INDIA गठबंधन को साझा नारे से आगे साझा विकास एजेंडा बनाना होगा

INDIA गठबंधन में अनेक राजनीतिक दल शामिल हैं। इन दलों की विचारधाराएं, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। किसी भी गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव के समय एक मंच पर आना नहीं, बल्कि जनता के सामने एक साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है। गठबंधन के नेताओं को यह तय करना होगा कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, महिला सशक्तीकरण, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था को लेकर उनका साझा दृष्टिकोण क्या है। उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि यदि केंद्र में उनकी सरकार बनती है, तो प्रशासनिक पारदर्शिता और संघीय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कौन-से कदम उठाए जाएंगे।
केवल भाजपा विरोध गठबंधन की स्थायी राजनीतिक पहचान नहीं बन सकता। एक सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करना होगा। ऐसा विकल्प, जिसके पास नेतृत्व की स्पष्टता हो, आर्थिक नीति का रोडमैप हो और विकास का मापने योग्य लक्ष्य हो। यदि गठबंधन के सहयोगी दल अपने-अपने राज्यों में बेहतर शासन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और फिर उन्हीं उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर साझा करते हैं, तो उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है।

अंत मे लोकतंत्र में जनता का फैसला ही अंतिम है। दिल्ली के रामलीला मैदान की रैली को विपक्ष के लोकतांत्रिक विरोध और राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन इस रैली की वास्तविक राजनीतिक सफलता इस बात से तय होगी कि विपक्ष अपने आरोपों के साथ कितना ठोस समाधान प्रस्तुत करता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना एक राजनीतिक मुद्दा हो सकता है, लेकिन इससे कांग्रेस और INDIA गठबंधन की राजनीतिक चुनौतियों का समाधान नहीं होगा।

यदि चुनाव व्यवस्था में कोई खामी है, तो उसे प्रमाणों के आधार पर दूर किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है। लेकिन विपक्ष को यह भी समझना होगा कि देश की जनता अब केवल आंदोलन और नारों से प्रभावित होने वाली नहीं है। वह सरकारों के काम की तुलना करती है। वह जानना चाहती है कि किस राज्य में बेहतर शिक्षा है, कहां अस्पताल बेहतर हैं, कहां रोजगार के अवसर अधिक हैं और किस सरकार का प्रशासन अधिक जवाबदेह है।

कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पास अभी भी अवसर है। उन्हें अपने शासन वाले राज्यों को विकास, सुशासन और आधुनिक प्रशासन का उदाहरण बनाना चाहिए। भाजपा ने गुजरात सहित अपने शासन वाले राज्यों के अनुभवों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में स्थान देकर अपनी राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाया। विपक्ष को भी अपने राज्यों में ऐसी उपलब्धियां स्थापित करनी होंगी, जिनके आधार पर वह राष्ट्रीय स्तर पर जनता से विश्वास मांग सके।
राजनीति में सत्ता का रास्ता केवल विरोध से नहीं, विकल्प से बनता है। रैलियां भीड़ जुटा सकती हैं, आंदोलन मुद्दे उठा सकते हैं और आरोप राजनीतिक बहस पैदा कर सकते हैं, लेकिन जनता का स्थायी विश्वास केवल अच्छे शासन, विकास और परिणामों से ही अर्जित किया जा सकता है।

आज कांग्रेस और INDIA गठबंधन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है क्या वे केवल सत्ता में बैठे लोगों से जवाब मांगेंगे, या अपने शासन वाले राज्यों में भी जनता को जवाब देने की जिम्मेदारी निभाएंगे? क्योंकि लोकतंत्र में जवाबदेही केवल केंद्र सरकार की नहीं होती, हर राज्य सरकार की भी होती है।

अंततः जनता को यह नहीं देखना कि कौन किसके इस्तीफे की मांग कर रहा है। जनता यह देखना चाहती है कि कौन उसके भविष्य को बेहतर बनाने की क्षमता रखता है। यही लोकतंत्र की असली ताकत है और यही भारतीय राजनीति का भविष्य भी तय करेगा।

-नीरज तिवारी

( राजनीतिक विश्लेषक | सामाजिक  विचारक)

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