मप्र कांग्रेस के मुख्यालय में हुई यूथ कांग्रेस की बैठक ने एक बार फिर यह संकेत दे दिया है कि पार्टी के भीतर असंतोष अब दबा हुआ नहीं रह गया है। बैठक के दौरान प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का यह सवाल कि ‘मेरा काम कैसा है?’ शायद आत्ममंथन के उद्देश्य से पूछा गया होगा, लेकिन कार्यकर्ताओं के जवाब ने यह साफ कर दिया कि जमीनी स्तर पर कहीं न कहीं नाराजगी पनप रही है।
राजनीतिक दलों में बैठकों के दौरान मतभेद होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब कार्यकर्ता खुले मंच पर यह कहने लगें कि उनसे मुलाकात नहीं होती, उनकी बात नहीं सुनी जाती और संगठन में पक्षपात की भावना दिखाई देती है, तो यह केवल व्यक्तिगत शिकायत नहीं रह जाती, बल्कि संगठनात्मक संकट का संकेत बन जाती है। यूथ कांग्रेस की इस बैठक में जो कुछ हुआ, उसने यही संदेश दिया कि संवाद की कमी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। कार्यकर्ताओं का यह कहना कि वे वर्षों से मिलने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन तवज्जो नहीं मिलती, केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं है। यह उस भावना का प्रतीक है जो अक्सर बड़े राजनीतिक संगठनों में नीचे के स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं के मन में घर कर जाती है। संगठन की मजबूती का आधार वही कार्यकर्ता होते हैं, जो बूथ से लेकर गांव और वार्ड तक पार्टी का चेहरा बनते हैं। यदि वही खुद को उपेक्षित महसूस करें, तो राजनीतिक रणनीति कितनी भी मजबूत क्यों न हो, उसका असर सीमित ही रह जाता है। बैठक में हंगामा, नारेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप ने यह भी दिखाया कि युवा नेतृत्व के बीच तालमेल की कमी है। जब राष्ट्रीय प्रभारी की मौजूदगी में ही यह दृश्य हो और प्रदेश नेतृत्व बेबस नजर आए, तो यह संकेत है कि संगठनात्मक अनुशासन और संवाद दोनों को मजबूत करने की जरूरत है। दरअसल, कांग्रेस इस समय मप्र में खुद को पुनर्गठित और मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में यदि अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आता है, तो यह सत्तारूढ़ दल भाजपा के लिए राजनीतिक हथियार भी बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि नेतृत्व आलोचना को केवल विरोध के रूप में न देखे, बल्कि उसे सुधारात्मक के नजरिये से देखे और उस पर आत्म मंथन करे।
-मिलिंद ठाकरे

