बिहार में भी खिलेगा ‘लाल सोना’, कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हुई हासिल

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पटना। अब तक जम्मू-कश्मीर जैसे ठंडे और विशेष जलवायु वाले इलाकों तक सीमित रही केसर की खेती अब बिहार में भी संभव होने जा रही है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर ने कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए केसर उत्पादन की दिशा में नया अध्याय जोड़ दिया है।

रिसर्च को मिली राष्ट्रीय पहचान

बीएयू सबौर को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से “A Growth Media Composition for Rapid In-Vitro Direct Organogenesis of Saffron” नामक इनोवेशन पर पेटेंट मिला है। यह पेटेंट केसर के पौधों को नियंत्रित वातावरण में तेजी से विकसित करने की तकनीक से जुड़ा है, जो बिहार जैसी जलवायु में खेती को संभव बनाएगा।

किसानों के लिए खुला हाई-वैल्यू खेती का नया विकल्प

यह शोध सिर्फ वैज्ञानिक सफलता नहीं, बल्कि बिहार के किसानों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब तक केसर की खेती के लिए ठंडा तापमान और खास भौगोलिक परिस्थितियां जरूरी थीं, लेकिन बीएयू के वैज्ञानिकों ने इन-विट्रो और प्लांट टिश्यू कल्चर तकनीक के जरिए इस चुनौती का समाधान निकाल लिया है। नई तकनीक से बिहार की जलवायु के अनुकूल केसर के पौधे तैयार किए जा रहे हैं।

90 से 110 दिन में तैयार होंगे केसर के पौधे

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तकनीक से सिर्फ 90 से 110 दिनों में स्वस्थ केसर के पौधे विकसित किए जा सकेंगे। इन पौधों की खेती पॉलीहाउस और नेट हाउस में की जा सकती है, जिससे उत्पादन नियंत्रित और सुरक्षित रहेगा।

किसानों को मिलेगा प्रशिक्षण

यह शोध बीएयू के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह के मार्गदर्शन और वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. अनिल कुमार सिंह के नेतृत्व में पूरा हुआ, जिसमें वैज्ञानिक टीम की अहम भूमिका रही। विश्वविद्यालय किसानों को प्रमाणिक प्लांट मटेरियल उपलब्ध कराने के साथ-साथ वैज्ञानिक प्रशिक्षण भी देगा, ताकि किसान केसर की खेती से बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा कमा सकें।