इंदौर में महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल के यहां लोकायुक्त की कार्रवाई ने एक बार फिर सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की गंभीर समस्या को उजागर किया है। प्रारंभिक जांच में आय से कहीं अधिक संपत्ति मिलने की बात सामने आई है। यह मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की ओर संकेत करता है जहां पद और अधिकार का दुरुपयोग कर अवैध संपत्ति अर्जित करने की प्रवृत्ति समय-समय पर सामने आती रहती है। देश में लोकायुक्त, आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो और अन्य जांच एजेंसियां नियमित रूप से छापेमारी कर करोड़ों रुपये की संदिग्ध संपत्तियों का खुलासा करती हैं। इसके बावजूद भ्रष्टाचार पर अपेक्षित अंकुश नहीं लग पा रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया वर्षों तक चलती रहती है। आरोपी अधिकारियों को निलंबित तो कर दिया जाता है, लेकिन अंतिम निर्णय आने में इतना समय लग जाता है कि कई बार वे सेवा से सेवानिवृत्त भी हो जाते हैं। इससे न केवल कानून का भय कमजोर पड़ता है, बल्कि समाज में गलत संदेश भी जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल छापों और खुलासों से नहीं जीती जा सकती। जब तक दोषियों को समयबद्ध और कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है। आय से अधिक संपत्ति के मामलों में विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि मुकदमों का शीघ्र निपटारा हो सके। दोष सिद्ध होने पर अवैध संपत्ति जब्त करने, पेंशन और अन्य सेवा लाभ रोकने जैसी कठोर व्यवस्थाओं को भी प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है। सरकारी अधिकारी जनता के धन से वेतन प्राप्त करते हैं और उन पर सार्वजनिक हित में कार्य करने की जिम्मेदारी होती है। यदि कोई अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर निजी संपत्ति खड़ी करता है, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जनविश्वास के साथ विश्वासघात भी है। ऐसे मामलों में उदाहरणात्मक कार्रवाई ही दूसरों के लिए निवारक साबित हो सकती है। लोकायुक्त की कार्रवाई स्वागतयोग्य है, लेकिन जनता अब केवल छापों की खबरें नहीं, बल्कि उनके ठोस परिणाम देखना चाहती है। भ्रष्टाचार पर वास्तविक प्रहार तभी होगा, जब अवैध संपत्ति अर्जित करने वालों को त्वरित और कठोर दंड मिलेगा। सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में यह सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।
-मिलिंद ठाकरे

