भागीरथपुरा की त्रासदी के बाद तकनीक का सहारा, लेकिन सवाल यह- जब अफसरों और कर्मचारियों की पूरी फौज मौजूद थी तो खतरे का पता पहले क्यों नहीं चला? इंदौर के भागीरथपुरा की त्रासदी ने मप्र की पेयजल और सीवर व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दूषित पानी से हुई मौतों के बाद अब सरकार पानी और सीवर लाइनों की निगरानी के लिए रोबोटिक तकनीक का सहारा लेने की तैयारी कर रही है। तकनीक आधुनिक है, उपयोगी भी हो सकती है, लेकिन सवाल तकनीक से बड़ा है-क्या सरकार व्यवस्था की बीमारी का इलाज कर रही है या उसकी नाकामी पर तकनीक का पर्दा डाल रही है? रोबोट पाइपलाइन के भीतर जाकर लीकेज, टूट-फूट, जाम और दूसरी तकनीकी खामियों का पता लगा सकते हैं। जहां इंसान का पहुंचना मुश्किल या जोखिमभरा है, वहां यह तकनीक निश्चित रूप से मददगार साबित हो सकती है। लेकिन भागीरथपुरा के बाद असली सवाल यह नहीं है कि रोबोट क्या कर सकता है। सवाल यह है कि अब तक जो व्यवस्था मौजूद थी, वह क्या कर रही थी? सरकार के पास इंजीनियर हैं, तकनीकी कर्मचारी हैं, निरीक्षण अमला है, अधिकारी हैं और पाइपलाइनों की देखरेख तथा रखरखाव के लिए अलग से बजट भी है। इस पूरे तंत्र पर हर साल जनता का पैसा खर्च होता है। इसके बावजूद यदि पेयजल और सीवर व्यवस्था के बीच ऐसी गंभीर गड़बड़ी पैदा हो जाती है कि लोगों की जान चली जाए, तो सबसे पहले नई मशीन खरीदने की नहीं, पुरानी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने की जरूरत है।
सवाल सीधा है-क्या पुरानी और जर्जर पाइपलाइनों का नियमित निरीक्षण हो रहा था? क्या संवेदनशील इलाकों की अलग से निगरानी की गई? क्या स्थानीय शिकायतों को गंभीर तकनीकी संकेत माना गया? क्या लीकेज और टूट-फूट की सूचना मिलने के बाद समय पर कार्रवाई हुई? और सबसे महत्वपूर्ण-जिस अधिकारी और कर्मचारी की जिम्मेदारी निगरानी की थी, उसकी जवाबदेही कहां तय हुई? अगर इन सवालों का जवाब नहीं मिलता तो रोबोट को पाइपलाइन में उतारना समस्या का समाधान कम और व्यवस्था की नाकामी से ध्यान हटाने की कवायद ज्यादा दिखाई देगा। दूसरा सवाल खर्च का है। सरकार रोबोटिक निगरानी के लिए नया तंत्र खड़ा करेगी। मशीनें खरीदी जाएंगी, उनका संचालन होगा, तकनीकी विशेषज्ञ लगाए जाएंगे, रखरखाव होगा और संभव है कि इसके लिए अलग से ठेके भी दिए जाएं। लेकिन तब मौजूदा निरीक्षण अमले का क्या होगा? क्या उसकी जिम्मेदारियां बदली जाएंगी? क्या कर्मचारियों की संख्या घटेगी? क्या पुराने निरीक्षण और रखरखाव का खर्च कम होगा? या फिर रोबोट भी रहेंगे, अधिकारी भी रहेंगे, कर्मचारी भी रहेंगे और खर्च भी बढ़ता जाएगा?
अगर ऐसा हुआ तो तकनीकी सुधार के नाम पर जनता पर दोहरा आर्थिक बोझ पड़ेगा। एक तरफ पुराना तंत्र जस का तस रहेगा और दूसरी तरफ उसके ऊपर रोबोटिक निगरानी की नई लागत जुड़ जाएगी। ऐसी स्थिति में सरकार को यह बताना चाहिए कि नई व्यवस्था से पुराने खर्च में कितनी बचत होगी और जवाबदेही की व्यवस्था कैसे बदलेगी। जवाबदेही का सवाल इससे भी गंभीर है। मान लीजिए रोबोट किसी पाइपलाइन में गंभीर खामी पकड़ लेता है। रिपोर्ट तैयार हो जाती है, खतरे की जानकारी विभाग तक पहुंच जाती है, लेकिन मरम्मत में देरी होती है और बाद में कोई दुर्घटना हो जाती है। तब जिम्मेदार कौन होगा? रोबोट बनाने वाली कंपनी? निरीक्षण एजेंसी? संबंधित अधिकारी? मरम्मत का ठेका लेने वाला ठेकेदार? या विभाग? रोबोट खामी खोज सकता है, लेकिन खामी दूर करने का फैसला और जिम्मेदारी इंसानों की ही होगी। इसलिए भागीरथपुरा के बाद सरकार को केवल नई तकनीक की घोषणा करके आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। प्रदेश की जल और सीवर व्यवस्था का व्यापक तकनीकी और प्रशासनिक ऑडिट होना चाहिए। कितनी पाइपलाइनें पुरानी हैं? उनका अंतिम निरीक्षण कब हुआ? कितनी जगह लीकेज या टूट-फूट मिली? कितनी पाइपलाइन बदली गईं? कितनी शिकायतें मिलीं? कितनी शिकायतों पर कार्रवाई हुई? और किस अधिकारी ने किस क्षेत्र की निगरानी की? इन सवालों का सार्वजनिक और जवाबदेह रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। आधुनिक तकनीक अपने आप में सुधार की गारंटी नहीं है। असली कसौटी यह है कि उससे हादसे रुकते हैं या नहीं, शिकायतों पर कार्रवाई तेज होती है या नहीं, पुराना खर्च तर्कसंगत होता है या नहीं और सबसे बढ़कर-लापरवाही होने पर जिम्मेदार व्यक्ति तक जवाबदेही पहुंचती है या नहीं। भागीरथपुरा की त्रासदी से सरकार को यदि सचमुच सबक लेना है तो सबक सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि पाइपलाइनों में रोबोट उतार दिए जाएं। सबक यह भी होना चाहिए कि जिस सरकारी मशीनरी को खतरे का पता पहले लगाना था, उसकी कार्यप्रणाली की भी जांच हो। क्योंकि रोबोट पाइपलाइन के भीतर की दरार देख सकता है, लीकेज पकड़ सकता है और जाम का पता लगा सकता है। लेकिन व्यवस्था के भीतर की दरार, लापरवाही और जवाबदेही के अभाव को कोई रोबोट ठीक नहीं कर सकता। उसके लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। वरना खतरा यह है कि पुरानी नाकामी जस की तस रहेगी और उसके ऊपर जनता के पैसे से एक नई, महंगी तकनीकी परत चढ़ जाएगी।
-मिलिंद ठाकरे

