दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में लगातार बढ़ते लापता लोगों के मामलों ने अब न्यायपालिका को भी झकझोर दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बढ़ते संकट को गंभीर सामाजिक चेतावनी बताते हुए केंद्र, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस से कड़ा जवाब मांगा है। अदालत ने पूछा कि क्या इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में भी कोई मामला लंबित है और पूरे मसले को व्यापक स्तर पर समझने के लिए विस्तृत जवाब तलब किया है। अगली सुनवाई 18 फरवरी को होगी।
एनजीओ की चेतावनीः राजधानी में अभूतपूर्व मानवीय संकट
एनजीओ फ्रीडम रिक्लेम्ड की याचिका के अनुसार दिल्ली में लापता लोगों की संख्या अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। दावा है कि साल 2026 के पहले 15 दिनों में ही 800 से ज्यादा लोग लापता हुए, जो आंकड़ों को बेहद भयावह स्थितियों की ओर इशारा करता है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि तेजी से बढ़ते मामलों के बावजूद प्रशासन की कार्रवाई उतनी तेज़ नहीं है, जितनी हालात मांगते हैं।
पुलिस पर गंभीर सवालः ‘गोल्डन ऑवर’ की अनदेखी
याचिका में कहा गया है कि कई मामलों में शुरुआती घंटे (गोल्डन ऑवर) में कार्रवाई नहीं होती। एफआईआर दर्ज करने में देरी होती है। ढीली जांच व्यवस्था अपराधियों को मौका देती है। दिल्ली पुलिस के अपने आंकड़े बताते हैं कि 2016 से 15 जनवरी 2026 तक कुल 2,32,737 लोग लापता हुए, जिनमें से 52,326 अभी तक नहीं मिले, 6,931 बच्चे अब भी गायब हैं। ये आंकड़े इस ओर संकेत करते हैं कि खोज और ट्रैकिंग सिस्टम में बड़े सुधार की जरूरत है।
हाईकोर्ट का सुझावः ‘उच्च स्तरीय कमेटी’ बने
याचिका में एक ऐसी कमेटी बनाने की मांग की गई है, जो अस्पतालों में भर्ती अज्ञात मरीजों, मुर्दाघरों में रखे अज्ञात शव और लापता व्यक्तियों के रिकॉर्ड का नियमित डेटा मैचिंग कर सके। मकसद यह है कि पहचान और खोज प्रक्रिया तेज हो और लंबित मामलों की संख्या कम की जा सके। 18 फरवरी को अदालत केंद्र, राज्य और पुलिस से विस्तृत जवाब मांगेगी और यह तय करेगी कि आगे क्या कदम उठाए जाएं।


