अस्पताल वह जगह है जहां आदमी अपनी जिंदगी बचाने की आखिरी उम्मीद लेकर पहुंचता है। लेकिन जब यही अस्पताल नवजातों के लिए मौत का ठिकाना बनने लगें तो सवाल केवल व्यवस्था पर नहीं, उस पूरी सोच पर उठना चाहिए जो स्वास्थ्य सेवाओं को भवन, मशीन और बजट के आंकड़ों में नापती है। महाराष्ट्र के अमरावती में नवजात शिशु कक्ष में आग से तीन बच्चों की मौत और मप्र के छिंदवाड़ा में नवजातों के झुलसने की घटना किसी सामान्य दुर्घटना की श्रेणी में डालकर भुलाई नहीं जा सकती। ये घटनाएं अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन कक्षों में ऐसे बच्चों को रखा जाता है, वहां सुरक्षा की जांच आखिर कितनी गंभीरता से होती है? बिजली के तार, ऑक्सीजन व्यवस्था, वेंटिलेटर और दूसरे उपकरणों की नियमित जांच का प्रावधान क्या केवल कागजों के लिए है? आग लगने की स्थिति में नवजातों को बाहर निकालने की जिम्मेदारी किसकी है और क्या वहां तैनात कर्मचारियों को इसकी व्यावहारिक ट्रेनिंग दी जाती है? अगर इन सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हैं तो अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग दोनों को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करती हैं। नए अस्पताल बनते हैं, अत्याधुनिक मशीनें खरीदी जाती हैं और सुविधाओं के विस्तार के दावे होते हैं। लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा किसी उद्घाटन समारोह में नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में होती है।
अस्पताल के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले हिस्से में यदि आग, धुआं या बिजली की खराबी बच्चों की जान ले सकती है तो फिर अत्याधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के दावे खोखले ही माने जाएंगे। नवजातों के मामले में लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। वे न चल सकते हैं, न बोलकर मदद मांग सकते हैं और न ही खतरा समझकर खुद को बचा सकते हैं। उनका जीवन पूरी तरह अस्पताल के कर्मचारियों और व्यवस्था के भरोसे होता है। इसलिए नवजात गहन चिकित्सा कक्षों में सुरक्षा के मानक भी सामान्य वार्डों से कई गुना अधिक कठोर होने चाहिए।
हर हादसे के बाद जांच समिति बैठाना, दोषियों की तलाश करना और मुआवजे की घोषणा कर देना आसान रास्ता है। कठिन काम है ऐसी व्यवस्था खड़ी करना जिसमें हादसा होने से पहले खतरे को पहचान लिया जाए। अस्पतालों के संवेदनशील वार्डों का नियमित सुरक्षा ऑडिट हो। बिजली और चिकित्सा उपकरणों की समयबद्ध जांच हो। फायर अलार्म, अग्निशमन उपकरण और आपातकालीन निकासी मार्ग हर समय दुरुस्त रहें। कर्मचारियों को केवल कागजी प्रशिक्षण नहीं, बल्कि नियमित मॉक ड्रिल कराई जाए। इन व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी तय हो और लापरवाही मिलने पर जवाबदेही भी तय हो। दोषी कौन है, यह जांच से सामने आएगा। लेकिन यह सवाल जांच के इंतजार में नहीं छोड़ा जा सकता कि अगला हादसा रोकने के लिए अभी क्या किया जा रहा है। प्रशासन की जिम्मेदारी केवल हादसे के बाद सक्रिय होना नहीं, बल्कि उससे पहले खतरे को खत्म करना है।
नवजातों की मौत महज एक संख्या नहीं होती। हर मौत के पीछे एक परिवार की उम्मीद टूटती है, मां की गोद सूनी होती है और पिता के भविष्य के सपने बिखर जाते हैं। इसलिए अस्पतालों में सुरक्षा को सुविधा नहीं, अनिवार्यता मानना होगा। जिस जगह जिंदगी बचाने की शपथ ली जाती है, वहां लापरवाही से जिंदगी खत्म होना किसी भी सभ्य व्यवस्था के लिए शर्मनाक है। अस्पतालों को मौत के बाद संवेदना जताने की जगह बनने से बचाना होगा। मासूमों की जिंदगी की कीमत जांच रिपोर्ट नहीं, हादसे से पहले की गई सतर्कता तय करेगी।
-मिलिंद ठाकरे

