बालाघाट: बालाघाट जिले के बिरसा ब्लाक के बैगा बहुल गांवों में बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का दावा है कि पिछले चार महीनों में अलग-अलग गांवों में करीब 20 बच्चों की मौत हुई है, जबकि स्वास्थ्य विभाग अब तक केवल आठ मौतों की पुष्टि कर रहा है। ऐसे गंभीर मामले में सरकार का पहला दायित्व मृत बच्चों की संख्या पर बहस करना नहीं, बल्कि हर मौत की निष्पक्ष जांच, बीमारी के कारणों की पड़ताल और जिम्मेदार स्वास्थ्य अमले पर कार्रवाई करना होना चाहिए था।
लेकिन घटना सामने आने के बाद जिले के प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह प्रभावित क्षेत्र में पहुंचे तो उम्मीद थी कि वे स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की जमीनी हकीकत देखेंगे, डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की उपलब्धता की समीक्षा करेंगे और लापरवाही सामने आने पर जवाबदेही तय करने के निर्देश देंगे। इसके बजाय कांग्रेस पर आदिवासी बच्चों की मौत के मामले में राजनीति करने का आरोप लगाकर लौट जाना सरकार की संवेदनशीलता पर ही सवाल खड़ा करता है।
20 मौतों के दावे पर आठ का सरकारी आंकड़ा क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ग्रामीण और स्थानीय जनप्रतिनिधि 20 बच्चों की मौत का दावा कर रहे हैं और कई परिवार अपने बच्चों की मौत की जानकारी सामने रख रहे हैं, तो प्रशासन ने अब तक केवल आठ मौतें ही क्यों दर्ज की हैं? क्या बाकी मौतों की कोई जांच हुई? क्या उनके मृत्यु प्रमाण, इलाज और बीमारी से जुड़े रिकॉर्ड की पड़ताल की गई? यदि नहीं, तो केवल सरकारी आंकड़े को अंतिम सत्य मान लेने की जल्दबाजी क्यों?
मछूलदा गांव की बतिया बाई के चार वर्षीय बेटे कुंवर सिंह की जुलाई में मौत हुई। परिवार का कहना है कि बीमारी के बाद बच्चे की जान गई, लेकिन उसका नाम सरकारी मौतों के आंकड़ों में शामिल नहीं है। इसी तरह बोंदारी गांव के पांच वर्षीय सचिन की हालत बिगड़ने पर परिवार उसे बालाघाट और फिर गोंदिया के निजी अस्पताल ले गया। इलाज के लिए परिवार को करीब 50 हजार रुपए का कर्ज लेना पड़ा, लेकिन 31 जुलाई को बच्चे की मौत हो गई।
गटिया गांव की सात वर्षीय मंगली की मौत भी बीमारी के दौरान हुई। परिवार के अनुसार उसे बुखार, खांसी और शरीर पर दाने थे। इलाज के लिए ले जाते समय रास्ते में उसकी मौत हो गई। परिवार का कहना है कि उसके दो अन्य बच्चे भी बीमार हैं। कोण्डेकसा गांव में चैतू के बेटे अरविंद की भी बीमारी के दौरान मौत हुई। परिवार के मुताबिक जांच में मलेरिया बताया गया था, लेकिन बाद में उसकी हालत अचानक बिगड़ी और उसकी मौत हो गई।
गांवों में डॉक्टर नहीं, फिर किस बात की राजनीति?
ग्रामीणों की शिकायत है कि कई गांवों में महीनों से डॉक्टर नियमित रूप से नहीं पहुंच रहे हैं। कई इलाकों में अस्पताल तक पहुंचने के लिए 30 से 40 किलोमीटर तक जाना पड़ता है। बारिश में रास्ते खराब हैं। पेयजल की स्थिति खराब है और ग्रामीणों को जमीन से रिसने वाला पानी तक पीना पड़ रहा है।
ऐसे हालात में सवाल कांग्रेस की राजनीति का नहीं, बल्कि सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था का है। यदि किसी आदिवासी परिवार को अपने पांच साल के बच्चे के इलाज के लिए 50 हजार रुपए का कर्ज लेना पड़े और अंततः बच्चा बचाया न जा सके, तो सरकार को यह पूछना चाहिए कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था उस परिवार तक समय पर क्यों नहीं पहुंची।
152 बच्चे अस्पताल पहुंचे, 52 अब भी भर्ती
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अब तक 152 बच्चे अस्पताल में भर्ती हुए हैं और 52 बच्चे अभी भी भर्ती हैं। विभाग तीन क्षेत्रों में मौसमी बीमारी के प्रकोप की बात कह रहा है। साथ ही आठ बच्चों की मौत की पुष्टि की गई है। लेकिन जब विभागीय अधिकारियों के सामने आठ से अधिक मौतों की जानकारी रखी गई तो संबंधित बीएमओ को मौतों के कारणों की जांच के निर्देश दिए गए।
यानी सरकारी तंत्र स्वयं यह मान रहा है कि सामने आए मामलों की जांच जरूरी है। फिर सवाल यह है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक ग्रामीणों के दावों को राजनीतिक आरोप बताकर खारिज करने की इतनी जल्दी क्यों?
मौतों पर राजनीति नहीं, जवाबदेही चाहिए।
बैहर विधायक संजय उइके ने मृत बच्चों की संख्या 19 से अधिक होने की आशंका जताई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी प्रभावित गांवों का दौरा कर पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और कांग्रेस की ओर से प्रत्येक प्रभावित परिवार को 50-50 हजार रुपए की सहायता देने की घोषणा की है।
राजनीतिक दलों का प्रभावित क्षेत्र में जाना और सरकार से सवाल करना राजनीति हो सकता है, लेकिन इससे मूल सवाल खत्म नहीं हो जाता। सवाल यह है कि आखिर बच्चे मर क्यों रहे हैं? उन्हें समय पर इलाज क्यों नहीं मिल रहा? गांवों में डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी नियमित क्यों नहीं पहुंच रहे? टीकाकरण और स्वास्थ्य निगरानी में कमी क्यों रही? और सबसे महत्वपूर्ण-यदि मौतों का वास्तविक आंकड़ा आठ से अधिक है तो उसे सामने लाने में प्रशासन को आपत्ति क्यों होनी चाहिए?
प्रभारी मंत्री को कांग्रेस की राजनीति दिखाई दे सकती है, लेकिन उन परिवारों को क्या दिखाई दे रहा है जिन्होंने अपने बच्चे खो दिए? उन्हें राजनीति नहीं, अपने बच्चे की मौत का कारण और जिम्मेदार व्यवस्था चाहिए।
सरकार को आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर नौ गांवों में हुई सभी संदिग्ध बाल मृत्यु की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच करानी चाहिए। हर मौत का रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए और यदि स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर सरकार को सख्त कार्रवाई करना चाहिए।
प्रभावित गांवों और परिवारों की सूची
प्रभावित क्षेत्र की ग्राम पंचायतों और गांवों से बच्चों की मौत से जुड़े 20 नाम सामने आए हैं।
ग्राम पंचायत अड़ोरी – बोदांरी एवं कोण्डेकसा
- रूपलाल धुर्वे — पिता विश्राम धुर्वे
- शाहिल धुर्वे — पिता सम्हारू धुर्वे
- लमगिन धुर्वे — पिता सम्हारू धुर्वे
- पूजा धुर्वे — पिता चमटू
- सचिन मरकाम — पिता चैनसिंह
- रूपलाल — पिता दशरथ
- प्रीति मरकाम — पिता नेहरू
- अरविन्द धुर्वे — पिता चैतु
- प्रियंका धुर्वे — पिता सुखचंद
ग्राम पंचायत मछुरदा — मातला, मछुरदा, कोरका एवं गठिया
- रूही परते — पिता महासिंह
- राम परते — पिता महासिंह
- सदेसिंह मरकाम — पिता सन्जाद मरकाम
- सूरज मरकाम — पिता सगनू
- सुन्दरी मेरावी — पिता लक्ष्मी
- रोशन धुर्वे — पिता टेकसिंह
- मंगती मरकाम — पिता शहरसिंह
ग्राम पंचायत लालपुर — तेन्दूडेही
- रीवनू मरकाम — पिता चरन
ग्राम पंचायत घुम्मुर — चिखली खैरटोला एवं कोडबीरकोना
- सुरगीला — पिता भगलसिंह
- राजू तिलगाम — पिता पहाड़सिंह

