जिस राजधानी में 12 साल की मासूम बच्ची की जिंदगी सुरक्षित नहीं, वहां कानून-व्यवस्था के तमाम दावे बेमानी नजर आते हैं। विडंबना यह है कि इसी भोपाल में मध्य प्रदेश की सरकार बैठती है, पुलिस का मुखिया बैठता है और यहीं से पूरे प्रदेश की सुरक्षा की रणनीति तय होती है। इसके बावजूद बैरागढ़ में एक मासूम की नृशंस हत्या ने व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल सीधा है-जब राजधानी में ही बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं, तो प्रदेश में कानून के राज का दावा आखिर किस आधार पर किया जा रहा है? जिस बच्ची को परिजनों ने 15 अक्टूबर की शाम कबाड़ बीनने के लिए घर से निकलते देखा था, अगले दिन उसका शव खंडहर में मिला। एक परिवार की दुनिया उजड़ गई, लेकिन इस हृदयविदारक घटना ने पुलिस की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
परिजनों का आरोप है कि बच्ची के लापता होने की सूचना देने के बावजूद पुलिस ने उसकी तलाश में अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई। परिवार ने एक संदिग्ध को पुलिस के हवाले किया था, लेकिन बच्ची की बुआ के मुताबिक, पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया गया। शव मिलने के बाद आरोपी को दोबारा पकड़ा गया। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि शुरुआती स्तर पर लापरवाही हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। पुलिस का दायित्व सिर्फ अपराध होने के बाद आरोपी को गिरफ्तार करना नहीं है। उसका पहला कर्तव्य अपराध रोकना, संकट में फंसे नागरिकों की सहायता करना और लोगों के मन में सुरक्षा का भरोसा कायम रखना है। खासकर बच्चों के लापता होने के मामलों में शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे मामलों में हर सूचना को गंभीरता से लेना और तत्काल तलाश शुरू करना जरूरी है। यदि शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई में देरी हुई, तो इसे सामान्य चूक मानकर टाला नहीं जा सकता। आखिर एक परिवार ने अपनी बच्ची को खोजने के लिए पुलिस से ही उम्मीद लगाई थी।
इस घटना ने एक और असहज सवाल सामने रखा है। क्या कानून के सामने सभी नागरिक बराबर हैं? बच्ची की बुआ का यह सवाल कि क्या किसी अमीर परिवार की बेटी के मामले में भी पुलिस का रवैया ऐसा ही होता, व्यवस्था की संवेदनशीलता पर चोट करता है। गरीब परिवारों की शिकायतों को कम गंभीरता से लिया जाना किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। न्याय और सुरक्षा नागरिक की आर्थिक हैसियत देखकर तय नहीं किए जा सकते। पुलिस की निष्पक्षता का असली पैमाना यही है कि वह हर शिकायत पर समान तत्परता और गंभीरता से कार्रवाई करे। पुलिस पर काम का दबाव और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियां अपनी जगह हैं, लेकिन इन्हें कर्तव्य में लापरवाही का बहाना नहीं बनाया जा सकता। नागरिक थाने इसलिए पहुंचते हैं कि संकट के समय उन्हें मदद मिले। यदि उन्हें अपनी फरियाद सुनाने के लिए भटकना पड़े, तो पुलिस और जनता के बीच भरोसे की बुनियाद कमजोर होती है। अपराधियों में कानून का भय और आम लोगों में सुरक्षा का विश्वास तभी कायम रह सकता है, जब पुलिस की कार्रवाई समयबद्ध, निष्पक्ष और जवाबदेह हो। अब जरूरत केवल आरोपी को कठोर सजा दिलाने की मांग तक सीमित रहने की नहीं है। हत्या के मामले की निष्पक्ष जांच के साथ यह भी जांचा जाना चाहिए कि बच्ची के लापता होने की सूचना पर पुलिस ने क्या कदम उठाए, तलाश में कोई देरी हुई या नहीं और यदि लापरवाही हुई, तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है। दोष प्रमाणित होने पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए। साथ ही, बच्चों के लापता होने की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए पुलिस व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाने की जरूरत है। बैरागढ़ की मासूम को न्याय दिलाने का अर्थ केवल उसके हत्यारे को सजा दिलाना नहीं, बल्कि उन कमियों को दूर करना भी है, जिनसे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं और आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस करता है। राजधानी में हुई यह घटना पूरे प्रदेश की पुलिस व्यवस्था के लिए चेतावनी है। सरकार और पुलिस नेतृत्व को इसे महज एक आपराधिक वारदात मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। सवाल एक बच्ची की सुरक्षा का है, पुलिस की जवाबदेही का है और कानून के राज पर जनता के भरोसे का है। जब तक अपराध रोकने, शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई करने और लापरवाही के लिए जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, तब तक कानून-व्यवस्था के दावे जनता को भरोसा नहीं दिला पाएंगे।
-मिलिंद ठाकरे

