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गांधी सागर सैंक्चुरी में बढ़ा चीतों का कुनबा: CM मोहन यादव ने मादा चीता CCB-2 को छोड़ा, अब कुल 4 चीते

भोपाल/नीमच: मध्य प्रदेश की गांधी सागर वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी में चीतों का कुनबा बढ़ गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रविवार को बोत्सवाना से लाई गई मादा चीता CCB-2 को नीमच जिले की गांधी सागर सैंक्चुरी में छोड़ा। इसके बाद यहां चीतों की संख्या बढ़कर चार हो गई है। इनमें दो नर और दो मादा चीते शामिल हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार लगातार चीता संरक्षण की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने इसे वन्यजीव संरक्षण के साथ मध्य प्रदेश के ईको सिस्टम और जैव-विविधता के लिए भी महत्वपूर्ण बताया।

‘जियो और जीने दो’ की भावना का प्रतीक

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में मध्य प्रदेश में प्रोजेक्ट चीता आगे बढ़ रहा है। एशिया से एक समय चीते विलुप्त हो गए थे, लेकिन अब मध्य प्रदेश की धरती पर एक बार फिर चीते विचरण कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि प्रदेश में वर्तमान में चीते और उनके शावकों की संख्या 56 है। चीता संरक्षण की दिशा में हो रहे प्रयास वन्यजीवों के प्रति ‘जियो और जीने दो’ की भावना को दर्शाते हैं। मुख्यमंत्री ने वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को भी इस उपलब्धि के लिए बधाई दी।

गांधी सागर में अब 2 नर और 2 मादा चीते

CCB-2 के आने के बाद गांधी सागर सैंक्चुरी में अब दो नर और दो मादा चीते हो गए हैं। मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में यहां चीतों के परिवार का विस्तार हो सकता है। उन्होंने बताया कि पहले छोड़े गए चीते पावक और प्रभास भी स्वस्थ हैं।

सीएम ने कहा कि मध्य प्रदेश का वन और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में समृद्ध इतिहास रहा है। चीते की दोबारा मौजूदगी प्रदेश के प्राकृतिक वैभव और जैव-विविधता के संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को दिखाती है।

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पर्यटन और रोजगार को भी मिल रहा बढ़ावा

मुख्यमंत्री के मुताबिक प्रोजेक्ट चीता का असर केवल वन्यजीव संरक्षण तक सीमित नहीं है। इससे आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन और रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआत में स्थानीय ग्रामीणों के मन में प्रोजेक्ट को लेकर कुछ संशय था, लेकिन बाद में स्थितियां बदलीं और लोगों का सहयोग मिला।

मुख्यमंत्री ने असम से जंगली भैंसों को मध्य प्रदेश लाए जाने का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विलुप्त या कम हो चुकी वन्यजीव प्रजातियों के संरक्षण के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है और ऐसे प्रोजेक्ट स्थानीय समुदायों के सहयोग से ही सफल हो सकते हैं।

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