भोपाल। मध्यप्रदेश की मोहन सरकार एक बार फिर कर्ज के सहारे अपनी विकास योजनाओं को गति देने की तैयारी में है। फरवरी 2026 में 5200 करोड़ रुपये के नए ऋण के साथ राज्य पर कुल कर्ज का बोझ अब 62,300 करोड़ के पार पहुंचने वाला है, जिसने चिंता तो बढ़ा ही दी है, साथ सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।
मध्यप्रदेश की वित्तीय सेहत को लेकर आर्थिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान राज्य सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा कर्ज लेने का रिकॉर्ड बनाने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। आगामी 7 फरवरी को सरकार तीन अलग-अलग किश्तों में 5200 करोड़ रुपये का कर्ज बाजार से उठाएगी। इनमें 1200 करोड़ की अल्पावधि और 4000 करोड़ की लंबी अवधि (17 से 22 वर्ष) के ऋण शामिल हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्तीय वर्ष में मई से लेकर जनवरी तक सरकार पहले ही 57,100 करोड़ रुपये का ऋण ले चुकी है। अब इस नई किश्त के साथ यह आंकड़ा 62,300 करोड़ रुपये हो जाएगा। हालांकि सरकार का तर्क है कि यह कर्ज बुनियादी ढांचे के विकास और जनहितैषी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए अनिवार्य है, लेकिन अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि राजस्व आय और खर्च के बीच बढ़ता अंतर राज्य को ’डेब्ट ट्रैप’ (कर्ज के जाल) की ओर धकेल सकता है। लंबी अवधि के कर्ज का मतलब है कि आने वाली पीढ़ियों पर ब्याज का भारी बोझ पड़ेगा।
कर्ज के साये में विकास, मध्यप्रदेश सरकार फिर लेगी 5000 करोड़ का ऋण, वित्तीय प्रबंधन पर उठे सवाल


