सरकारी खजाना कोई ऐसी खुली अलमारी नहीं है, जहां जरूरत का नाम देकर जब चाहें हाथ डाल दिया जाए। इसमें रखा हर रुपया उस आम आदमी की कमाई से आता है, जो अपनी जरूरतें काटकर टैक्स देता है और बदले में सरकार से बेहतर सड़क, अस्पताल, स्कूल, पानी और रोजगार की उम्मीद करता है। ऐसे में मंत्रियों और अफसरों के नए वाहनों, कार्यालयों की सजावट, महंगे उपकरणों और गैर-जरूरी यात्राओं पर छह महीने की रोक सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं है। यह उस सरकारी सोच पर सवाल है, जिसमें कई बार जनता की जरूरत से पहले सरकारी सुविधा को प्राथमिकता मिल जाती है।
दिसंबर के पहले सप्ताह में विधानसभा के शीतकालीन सत्र में वित्त वर्ष 2026-27 का द्वितीय अनुपूरक बजट पेश होना है। इसके लिए विभागों से प्रस्ताव मांगे गए हैं। वित्त विभाग ने नए वाहनों की खरीदी के प्रस्तावों को फिलहाल रोक दिया है। अनुपूरक बजट में उन्हीं मदों को जगह मिलेगी, जो वास्तव में जरूरी हैं और जिनके लिए आकस्मिकता निधि से अग्रिम स्वीकृति मिल चुकी है। केंद्र से मिलने वाली वित्तीय सहायता से जुड़े प्रस्तावों को भी शामिल किया जा सकेगा।
लेकिन असली सवाल छह महीने की रोक नहीं, उसके बाद की सरकारी नीयत और व्यवस्था है। क्या रोक हटते ही फिर पुराने तर्क लौट आएंगे-वाहन पुराना है, फर्नीचर बदलना है, कार्यालय सजाना है, उपकरण नया लेना है और यात्रा जरूरी है? अगर ऐसा हुआ तो यह फैसला भी कुछ समय बाद सरकारी फाइलों में दर्ज एक और आदेश बनकर रह जाएगा।
सरकारी खर्च में समस्या सिर्फ रकम की नहीं, प्राथमिकता की है। जिस प्रदेश में बुनियादी सुविधाओं के लिए लगातार संसाधनों की जरूरत है, वहां हर खर्च से पहले यह पूछा जाना चाहिए, क्या यह जरूरी है? क्या इसके बिना काम नहीं चल सकता? और क्या जनता के पैसे का इससे बेहतर इस्तेमाल संभव है? इसलिए छह महीने की रोक को स्थायी वित्तीय अनुशासन की शुरुआत बनाना होगा। हर विभाग के खर्च की नियमित समीक्षा हो, गैर-जरूरी मदों की पहचान हो और बड़े खर्चों का औचित्य सार्वजनिक किया जाए।
जनता को सिर्फ योजनाओं का हिसाब नहीं चाहिए, अपने पैसे का हिसाब भी चाहिए। सरकारी खजाना सत्ता की सुविधा का साधन नहीं, जनता की अमानत है।
-मिलिंद ठाकरे

