अगर राजधानी में एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है, तो आम आदमी अपनी सुरक्षा को लेकर किस भरोसे के साथ सोए? भोपाल में राकेश अग्रवाल की घर में हुई हत्या ने सिर्फ एक परिवार को गहरे सदमे में नहीं डाला, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस अधिकारी ने वर्षों तक प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा रहकर व्यवस्था को करीब से देखा, वही अपने घर की चारदीवारी में हिंसा का शिकार हो गया। यह वारदात एक गंभीर सवाल छोड़ती है-क्या अपराधियों के मन से कानून का डर कम हो रहा है? और क्या पुलिस व्यवस्था आम नागरिक को वह भरोसा दे पा रही है, जिसकी उससे सबसे ज्यादा उम्मीद की जाती है? पुलिस हत्या की जांच में लूट, निजी विवाद और पुराने लेनदेन समेत कई पहलुओं को खंगाल रही है।
घर में काम करने वाला केयरटेकर भी जांच के दायरे में है और उसकी तलाश की जा रही है। जांच पूरी होने से पहले किसी की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की कई कमजोर कड़ियों को जरूर सामने ला दिया है। सबसे बड़ा सवाल घरेलू सहायकों के सत्यापन का है। बुजुर्ग और अकेले रहने वाले लोगों के घरों में केयरटेकर, ड्राइवर और दूसरे कर्मचारी लंबे समय तक परिवार का हिस्सा बनकर रहते हैं। ऐसे में उनकी पहचान, पता, पिछला रोजगार और संदर्भों का पुलिस सत्यापन सिर्फ कागजी प्रक्रिया बनकर नहीं रहना चाहिए। कर्मचारियों को उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
इस वारदात ने पुलिस के खौफ को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। अपराधी यदि कानून की पकड़ से बच निकलने की उम्मीद करने लगें, तो यह किसी भी शहर की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पुलिस की प्रभावशीलता का जवाब बयानों से नहीं, बल्कि अपराध रोकने, तेजी से जांच करने और दोषियों तक पहुंचने से मिलता है।
कानून-व्यवस्था की असली परीक्षा घटना के बाद होने वाली कार्रवाई से ज्यादा अपराध को रोकने की क्षमता में होती है। राकेश अग्रवाल हत्याकांड में सच्चाई सामने आना और दोषियों को कानून के कटघरे तक पहुंचाना जरूरी है। साथ ही बुजुर्गों और अकेले रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा तथा घरेलू कर्मचारियों के सत्यापन की व्यवस्था की भी गंभीर समीक्षा होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक रिटायर्ड आईएएस की सुरक्षा का नहीं है। सवाल उस आम आदमी के भरोसे का है, जो रात में अपने घर का दरवाजा बंद करता है और उम्मीद करता है कि बाहर कानून जाग रहा है।
-मिलिंद ठाकरे

