बालाघाट कांग्रेस में बढ़ता असंतोष, कार्यकर्ता पूछ रहे—”फिर हमारी भूमिका क्या थी?”
बालाघाट। कांग्रेस संगठन की रीढ़ माने जाने वाले कार्यकर्ताओं के बीच इन दिनों गहरी नाराजगी की चर्चा है। वजह है विधायक अनुभl मुंजारे के वे बयान, जिनमें वे बार-बार अपनी चुनावी जीत का श्रेय स्वयं को या अपने पति कंकर मुंजारे को देती दिखाई देती हैं। अब यह मुद्दा कांग्रेस के अंदर ही असंतोष का कारण बनता जा रहा है।
जमीनी कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के दौरान हजारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव, घर-घर जाकर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाया, विरोधियों का सामना किया, संसाधनों की कमी के बावजूद दिन-रात मेहनत की और कांग्रेस को जीत दिलाने के लिए अपना समय, श्रम और प्रतिष्ठा तक दांव पर लगा दी। लेकिन चुनाव जीतने के बाद यदि मंचों से यह संदेश दिया जाए कि जीत केवल व्यक्तिगत दम या पारिवारिक प्रभाव से मिली है, तो यह उन कार्यकर्ताओं के समर्पण का अपमान माना जाएगा।
कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि चुनाव केवल “अपने दम” पर जीता गया था, तो फिर बूथ स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं, ब्लॉक और मंडल पदाधिकारियों तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका आखिर क्या थी? क्या उनका संघर्ष और योगदान केवल चुनाव तक सीमित था?
कांग्रेस के कई पुराने कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव जीतने के बाद संगठन में लगातार कुछ चुनिंदा लोगों को ही महत्व दिया गया, जबकि वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेला गया। यही कारण है कि अंदरखाने असंतोष बढ़ता जा रहा है और कार्यकर्ताओं का एक वर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि की ताकत केवल उसकी व्यक्तिगत लोकप्रियता नहीं होती, बल्कि उसके पीछे खड़ा संगठन और समर्पित कार्यकर्ता होता है। जब कार्यकर्ता स्वयं को सम्मानित महसूस नहीं करता, तो उसका असर चुनावी मैदान में भी दिखाई देता है।
अब कांग्रेस के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि कार्यकर्ताओं की भावनाओं को लगातार नजरअंदाज किया गया और जीत का पूरा श्रेय व्यक्तिगत स्तर पर लिया जाता रहा, तो आने वाले विधानसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं का उत्साह पहले जैसा नहीं रहेगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अगला चुनाव कांग्रेस संगठन लड़ेगा या केवल कंकर मुंजारे और उनके करीबी लोगों के भरोसे चुनावी नैया पार लगाने की कोशिश की जाएगी?
बालाघाट की राजनीति में यह मुद्दा अब केवल एक बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संगठन और नेतृत्व के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बनता जा रहा है। आने वाले समय में यह असंतोष कितना बड़ा राजनीतिक रूप लेता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

