बालाघाट। नए साल के जश्न में जब लोग नियम-कायदों की सीमाएं भूल जाएं, तो उसका खामियाजा प्रकृति और वन्यजीवों को भुगतना पड़ता है। बालाघाट के कान्हा टाइगर रिजर्व की बफर जोन में 31 दिसंबर की रात डीजे, शराब और पार्टियों का शोर गूंजता रहा, जबकि जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे रहे।
कान्हा टाइगर रिजर्व, जो मध्यप्रदेश की शान और वन्यजीव संरक्षण का प्रतीक है, नए साल की रात अनुशासनहीनता का गवाह बना। बफर जोन और प्रतिबंधित क्षेत्रों में देर रात तक डीजे की तेज आवाज, शराब की बोतलें और पार्टियों का दौर चलता रहा।
वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों को खुलेआम ताक पर रख दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी इस पूरी गतिविधि से अनजान बने रहे, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे रहे।
सवाल यह उठता है कि बफर जोन में इस तरह की पार्टियों की अनुमति किसने दी? अगर अनुमति नहीं थी, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या वन अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह सब संभव था?
विशेषज्ञों का कहना है कि तेज आवाज, रोशनी और मानव गतिविधियां वन्यजीवों के व्यवहार को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। इससे न सिर्फ जानवरों का प्राकृतिक जीवन बाधित होता है, बल्कि शिकार जैसी गतिविधियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
गौरतलब है कि वर्ष 2025 में मध्यप्रदेश में 55 बाघों की मौत हो चुकी है, जो वन्यजीव संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े करती है। ऐसे में बफर जोन में इस तरह की लापरवाही भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।
नए साल का जश्न मनाना गलत नहीं, लेकिन प्रकृति और कानून की कीमत पर नहीं। अब जरूरत है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि दोबारा जंगलों की शांति को इस तरह रौंदा न जा सके।
नए साल का जश्न या वन्यजीवों से खिलवाड़? कान्हा बफर जोन में नियमों की खुलेआम उड़ीं धज्जियां


