नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र में शुक्रवार को भी राजनीतिक टकराव देखने को मिला। प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को लेकर विपक्ष ने गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग करते हुए लोकसभा और राज्यसभा में जोरदार हंगामा किया। शोर-शराबे के बीच दोनों सदनों की कार्यवाही प्रभावित रही, लेकिन इसी दौरान जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा से ध्वनिमत के जरिए पारित कर दिया गया। विपक्ष के लगातार विरोध के कारण विधेयक पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी और इसे बिना बहस के मंजूरी मिल गई। अब यह विधेयक आगे की संसदीय प्रक्रिया से गुजरेगा।
नए संशोधन से क्या बदलेगा ?
बता दें यह संशोधन जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1969 की धारा 13(3) में बदलाव करता है। सरकार का उद्देश्य देर से होने वाले जन्म और मृत्यु पंजीकरण को अधिक पारदर्शी, सत्यापित और सुरक्षित बनाना है, ताकि फर्जी दस्तावेजों और गलत एंट्री पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। मौजूदा नियमों के अनुसार जन्म या मृत्यु की सूचना 21 दिनों के भीतर देना अनिवार्य है। इसके बाद देरी होने पर अलग-अलग स्तर की अनुमति की व्यवस्था पहले से लागू है, जिसे अब और अधिक कड़ा किया गया है।
दो साल से अधिक देरी पर कोर्ट की मंजूरी जरूरी
संशोधित प्रावधानों के मुताबिक, यदि जन्म या मृत्यु का पंजीकरण एक वर्ष से अधिक लेकिन दो वर्ष के भीतर कराया जाता है, तो इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM), उप-मंडल मजिस्ट्रेट (SDM) या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति और तथ्यों का सत्यापन अनिवार्य होगा। वहीं, दो वर्ष से अधिक की देरी होने पर पंजीकरण केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate First Class) के आदेश के बाद ही संभव होगा।
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सत्यापन के बाद ही मिलेगी अनुमति
विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि संबंधित अधिकारी किसी भी विलंबित पंजीकरण को मंजूरी देने से पहले जन्म या मृत्यु से जुड़े सभी तथ्यों का सत्यापन करेगा। सरकार का कहना है कि इससे रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ेगी और फर्जी पंजीकरण की संभावना कम होगी।
विधेयक पारित होने के बावजूद संसद का अधिकांश समय विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच टकराव में बीता। विपक्ष ने गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार नारेबाजी की, जिसके चलते दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई और अंततः दिनभर के लिए स्थगित करनी पड़ी।

