जप्त वाहनों को किन आधारों पर छोड़ा गया? पंचनामा के दौरान ग्रामीणों को मौके से क्यों हटाया गया?
बालाघाट। तहसील किरनापुर के अंतर्गत आने वाले ग्राम बड़गांव-आमगांव में शासकीय भूमि पर अवैध उत्खनन का मामला इन दिनों सुर्खियों में है। ग्रामीणों का आरोप है कि जहां गरीबों को शासकीय जमीन के उपयोग को लेकर सख्ती का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर प्रभावशाली लोगों द्वारा खुलेआम मुरुम उत्खनन किया जा रहा था।
अवैध उत्खनन के खिलाफ की गई कार्रवाई के बाद जप्त किए गए जेसीबी और ट्रैक्टरों को अल्प समय में छोड़े जाने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। एक ओर जहां प्रशासन की शुरुआती कार्रवाई को सख्त कदम माना जा रहा था, वहीं वाहनों की रिहाई ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया जा रहा है कि राजस्व अमले द्वारा मौके पर मशीनों को जप्त किया गया था, लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर इन्हें छोड़ दिया गया। इस निर्णय के पीछे क्या कारण रहे, इस संबंध में अब तक कोई आधिकारिक स्पष्टता सामने नहीं आई है।
मामले में जानकारी प्राप्त करने के लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, किंतु अधिकांश जिम्मेदार अधिकारियों के फोन नहीं लग सके। इस स्थिति ने प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
गांव के चौक-चौराहों पर यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर जप्त किए गए वाहनों को किन परिस्थितियों में छोड़ा गया।
सूत्रों के अनुसार, शासकीय भूमि पर जेसीबी मशीन और ट्रैक्टर-ट्रॉली के माध्यम से मुरुम का अवैध उत्खनन किया जा रहा था। मौके पर नायब तहसीलदार, राजस्व अमला और ग्रामीणों की मौजूदगी में मशीनों को जप्त करते हुए पंचनामा बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
हालांकि, ग्रामीणों का आरोप है कि पंचनामा की प्रक्रिया के दौरान उन्हें मौके से हटा दिया गया। इसके बाद आगे की कार्रवाई को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आ सकी है, जिससे संदेह और गहरा गया है।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि वाहनों को अवैध गतिविधि में लिप्त पाए जाने पर जप्त किया गया था, तो उन्हें थाने या निर्धारित स्थान पर खड़ा क्यों नहीं किया गया। यही कारण है कि अब यह मामला पत्रकारों और आमजन के सवालों के घेरे में आ गया है।
सूत्र यह भी बताते हैं कि कार्रवाई के दौरान ली गई तस्वीरें और वीडियो मौजूद हैं, जिनमें जेसीबी और ट्रैक्टर द्वारा उत्खनन होते हुए दिखाई दे रहे हैं। बताया जाता है कि क्षेत्र में दिन-रात अवैध रूप से मुरुम और मिट्टी का उत्खनन किया जा रहा था और खुलेआम इसकी बिक्री हो रही थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि जप्त वाहनों को छोड़ने की प्रक्रिया में नियमानुसार प्रकरण दर्ज करना, जुर्माना अथवा अन्य दंडात्मक कार्रवाई तथा सक्षम अधिकारी की अनुमति आवश्यक होती है। यदि इन प्रक्रियाओं का पालन किया गया है, तो इसकी जानकारी सार्वजनिक किए जाने में विलंब क्यों हो रहा है, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है।
स्थानीय स्तर पर विभिन्न प्रकार की चर्चाएं सामने आ रही हैं, जिनमें प्रभावशाली लोगों के दबाव की बात भी कही जा रही है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन प्रशासन की चुप्पी इन आशंकाओं को बल देती नजर आ रही है।
अवैध उत्खनन जैसे मामलों में कार्रवाई के बाद ढील बरतने से शासन को राजस्व हानि होने की संभावना भी जताई जा रही है। जानकारों का मानना है कि यदि इस प्रकार के मामलों में पारदर्शिता नहीं बरती गई, तो इससे अवैध गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिल सकता है।
जिस तरह से सूत्रों से जानकारी मिल रही है कि तहसील विभागीय अधिकारियों द्वारा जेसीबी मशीन और ट्रैक्टर छोड़े जाने की बात सामने आई है, उसकी वास्तविक स्थिति जानने के लिए नायब तहसीलदार मैडम से दूरभाष के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया।
हालांकि, उनका मोबाइल स्विच ऑफ मिला, जिससे इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी।


