साल 2013 में मध्य प्रदेश में सामने आया व्यापमं परीक्षा घोटाला केवल एक घोटाला नहीं था, बल्कि देश के इतिहास में दर्ज सबसे बड़े और सबसे चर्चित महाघोटालों में से एक माना गया। इस मामले ने भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। लाखों युवाओं के सपनों और मेहनत से जुड़ी इस प्रणाली में कथित गड़बड़ियों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। यही वजह है कि वर्षों बाद भी जब इस मामले से जुड़ी कोई कानूनी कार्रवाई होती है, तो समाज में उसकी गूंज फिर से सुनाई देने लगती है। 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई और मप्र सरकार से अब तक की जांच का पूरा हिसाब मांगा है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि पूर्व विधायक पारस सकलेचा की शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, जांच की वर्तमान स्थिति क्या है और अब तक कितनी चार्जशीट दाखिल की गई हैं? इन सभी का विस्तृत विवरण शपथ पत्र के रूप में पेश किया जाए। सुनवाई के दौरान जब यह बात सामने आई कि पहले जारी नोटिसों पर संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, तो इस पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने दोनों पक्षों को बिंदुवार जानकारी देने के निर्देश दिए। अदालत का यह रुख इस बात का संकेत है कि इतने बड़े और संवेदनशील मामले में औपचारिक या अधूरी जानकारी अब स्वीकार्य नहीं होगी। यह कदम जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। दरअसल, व्यापमं घोटाले का प्रभाव केवल कुछ नियुक्तियों या परीक्षाओं तक सीमित नहीं था। इसने शासन-प्रशासन, शिक्षा व्यवस्था और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को भी कठघरे में खड़ा कर दिया था। युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों में यदि किसी तरह की अनियमितता सामने आती है, तो उसका असर केवल कानूनी दायरे तक नहीं रहता, बल्कि सामाजिक विश्वास भी प्रभावित होता है। यह भी उल्लेखनीय है कि इंदौर हाईकोर्ट ने अप्रैल 2024 में पारस सकलेचा की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वे इस मामले में प्रत्यक्ष प्रभावित पक्ष नहीं हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई यह बताती है कि बड़े सार्वजनिक महत्व के मामलों में व्यापक जनहित को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब अगली सुनवाई 16 अप्रैल को तय की गई है। अदालत के निर्देशों के बाद सीबीआई और राज्य सरकार को विस्तृत जानकारी देनी होगी। यह देखना होगा कि जांच की दिशा और अब तक की कार्रवाई कितनी स्पष्ट और ठोस रूप में सामने आती है। अगर इस प्रक्रिया से सच्चाई के नए पहलू सामने आते हैं, तो यह न केवल न्याय की दिशा में कदम होगा, बल्कि व्यवस्था में भरोसा बहाल करने का अवसर भी साबित हो सकता है। व्यापमं जैसे बड़े प्रकरण हमें यह याद दिलाते हैं कि पारदर्शिता और जवाबदेही ही किसी भी व्यवस्था की असली ताकत होती है और जब न्यायपालिका सक्रिय होती है, तो उम्मीद की किरण फिर से दिखाई देने लगती है।
-मिलिंद ठाकरे

