बालाघाट। नगर पालिका परिषद बालाघाट एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। नगर पालिका की कार्यप्रणाली और कथित लापरवाही को लेकर पहले भी डीजल घोटाले, निर्माण कार्यों में अनियमितता और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के आरोप लगते रहे हैं। अब मामला सीधे पर्यावरण संरक्षण और जनता के टैक्स के पैसे से जुड़ गया है। जानकारी के अनुसार नगर पालिका परिषद बालाघाट पर ₹17.67 करोड़ का पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति जुर्माना लगाया गया है, जिसकी भरपाई अंततः जनता के धन से होने की आशंका जताई जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, National Green Tribunal (एनजीटी) भोपाल में लंबित याचिकाओं और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 के पालन में विफलता को लेकर कार्रवाई की गई। आरोप है कि नगर पालिका द्वारा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित नहीं किया गया, जिसके चलते वैनगंगा नदी और शासकीय देवी तालाब में चार नालों का प्रदूषित पानी लगातार छोड़ा जाता रहा। इसके अलावा रेंगाटोला स्थित कचरा निस्तारण स्थल पर भी आवश्यक व्यवस्थाओं का अभाव पाया गया।
इन्हीं कारणों से Madhya Pradesh Pollution Control Board ने 1 जुलाई 2020 से 31 मार्च 2025 तक की अवधि के लिए नगर पालिका परिषद बालाघाट पर ₹17.67 करोड़ का जुर्माना लगाया। इस राशि की वसूली कलेक्टर बालाघाट के माध्यम से किए जाने के निर्देश दिए गए हैं।
एनजीटी ने खारिज की अपील
बता दें जुर्माने को चुनौती देने के लिए नगर पालिका परिषद ने एनजीटी भोपाल में अपील दायर की थी। हालांकि ट्रिब्यूनल ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि इसमें कोई ठोस आधार नहीं है। आदेश में स्पष्ट किया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों और कानूनी प्रावधानों के तहत समय सीमा समाप्त होने के बाद राहत देने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए अपील सुनवाई योग्य नहीं मानी गई और उसे निरस्त कर दिया गया।
कलेक्टर को वसूली और पर्यावरण बहाली के निर्देश
वहीं एनजीटी ने कलेक्टर बालाघाट को निर्देश दिए हैं कि वे पर्यावरणीय क्षति की भरपाई हेतु निर्धारित राशि की वसूली सुनिश्चित करें। यह राशि एक विशेष पर्यावरण फंड में जमा की जाएगी और इसका उपयोग उसी क्षेत्र में पर्यावरण सुधार, जल स्रोतों की सफाई, प्रदूषण नियंत्रण तथा बहाली कार्यों के लिए किया जाएगा। STP निर्माण और अन्य परियोजनाओं पर होने वाले खर्च का ऑडिट भी सक्षम अधिकारियों द्वारा किया जाएगा।
बड़ा सवाल: जिम्मेदारों पर कब होगी कार्रवाई?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वर्षों से एनजीटी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नगर पालिका को चेतावनी और निर्देश देते रहे, तो उनकी अनदेखी करने वालों की जवाबदेही कौन तय करेगा? यदि लापरवाही या प्रशासनिक विफलता के कारण नगर पालिका पर करोड़ों रुपए का जुर्माना लगा है, तो क्या इसकी जिम्मेदारी केवल जनता उठाएगी?
स्थानीय लोगों का मानना है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर उन अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए, जिनके कार्यकाल में नियमों का पालन नहीं हुआ। साथ ही यह भी मांग उठ रही है कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही या कर्तव्यहीनता सिद्ध होती है, तो संबंधित जिम्मेदारों पर विभागीय और दंडात्मक कार्रवाई की जाए।


