सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद भोपाल नगर निगम की नींद खुली है। आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग के खिलाफ धड़ाधड़ नोटिस जारी किए जा रहे हैं। दो दिनों में 2298 और अब तक 3316 नोटिस। एक दिन में 1135 नोटिस जारी करने की यह रफ्तार निगम की सक्रियता कम और उसकी पिछली निष्क्रियता पर ज्यादा सवाल खड़े करती है।
सवाल सीधा है-अब नोटिस दे रहा नगर निगम, पहले क्यों सोता रहा?निगम 62 हजार से ज्यादा ऐसी संपत्तियां चिन्हित कर रहा है, जहां आवासीय परिसरों में दुकानें, कार्यालय, गोदाम और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहे हैं। इनमें से ज्यादातर गतिविधियां कल से शुरू नहीं हुईं। वे वर्षों से चल रही हैं। लोग कारोबार करते रहे, किराया लेते रहे, ग्राहक आते-जाते रहे और निगम का तंत्र क्या करता रहा? यदि सब कुछ उसकी आंखों के सामने होता रहा तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद कार्रवाई का पहिया इतनी तेजी से घूमने लगा?
नियमों का पालन होना चाहिए। आवासीय क्षेत्रों की प्रकृति बचनी चाहिए। अवैध व्यावसायिक गतिविधियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन नियम लागू करने की जिम्मेदारी सिर्फ नागरिकों की नहीं होती। नगर निगम का काम केवल नोटिस बांटना नहीं, बल्कि नियमों की निगरानी करना भी है। अनुमति देना, निरीक्षण करना, उल्लंघन की पहचान करना और समय रहते कार्रवाई करना उसकी जिम्मेदारी है। अगर यह जिम्मेदारी वर्षों तक नहीं निभाई गई तो उसका जवाब भी निगम को देना चाहिए। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब कार्रवाई का असर उन लोगों पर पड़ रहा है जिन्होंने अपनी जिंदगी की जमा पूंजी लगाकर कारोबार खड़ा किया है।
अवधपुरी, अयोध्या बायपास, गौतम नगर, अशोका गार्डन और लालघाटी जैसे इलाकों में कारोबारियों की चिंता बढ़ रही है। कई लोग दुकानें खाली कर वैध व्यावसायिक क्षेत्रों में जगह तलाश रहे हैं। लेकिन क्या नगर निगम ने यह सोचा है कि इन कारोबारियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी? नियम तोड़े गए हैं तो कार्रवाई हो, लेकिन वर्षों तक व्यवस्था की चूक का पूरा बोझ भी क्या नागरिकों पर ही डाल दिया जाए? इससे भी गंभीर सवाल कथित वसूली की शिकायतों का है। यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के नाम पर नोटिस या कार्रवाई के लिए किसी तरह की अवैध वसूली हो रही है तो यह कानून के राज का मजाक होगा। निगम को ऐसी शिकायतों की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए।
अदालत का आदेश किसी अधिकारी-कर्मचारी को मनमानी का लाइसेंस नहीं देता।सबसे बड़ा सवाल उन 62 हजार से ज्यादा संपत्तियों का है। यदि इनका व्यावसायिक उपयोग नियमों के विपरीत था तो यह स्थिति एक-दो दिन में पैदा नहीं हुई। इतने वर्षों तक निरीक्षण कौन करता रहा? अनुमति किसने दी? भवनों का उपयोग बदलने की जानकारी किसे थी? शिकायतें आईं तो क्या कार्रवाई हुई? और अगर कार्रवाई नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई? इन सवालों के जवाब के बिना केवल नोटिस जारी करते चले जाना अधूरी कार्रवाई है।
निगम को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उसने अब तक कितने मामलों में कार्रवाई की, कितने मामलों में व्यावसायिक उपयोग की अनुमति थी और कितने मामलों में नियमों का उल्लंघन पाया गया। कार्रवाई का आधार भी सार्वजनिक होना चाहिए, ताकि किसी के साथ मनमानी न हो। कानून सबके लिए एक है तो उसका इस्तेमाल भी सब पर समान रूप से होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर वर्षों की प्रशासनिक लापरवाही पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। आज जिन लोगों से नियमों का हिसाब मांगा जा रहा है, उनसे पहले नगर निगम को अपनी निगरानी व्यवस्था का हिसाब देना चाहिए।
नियमों का उल्लंघन करने वाला जवाबदेह है, लेकिन नियमों के उल्लंघन को वर्षों तक देखते रहने वाला तंत्र भी सवालों से बाहर नहीं हो सकता। शहर को अवैध व्यावसायिक गतिविधियों से मुक्त करना जरूरी है, मगर यह काम पारदर्शिता, समानता और संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए। वरना सवाल यही रहेगा-नगर निगम की नींद जब खुली तो शहरवासियों को ही उसका खामियाजा क्यों भुगतना पड़े?
-मिलिंद ठाकरे

