ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने शासकीय जमीनों से जुड़े मामलों में प्रशासन की लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने मुख्य सचिव तक को जिम्मेदारी तय करने की चेतावनी दी है। इस टिप्पणी ने न केवल अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, बल्कि सरकार की जवाबदेही भी तय कर दी है।
सरकारी और सार्वजनिक भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण के मामलों को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट बेंच ने राज्य प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक अपील की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि कलेक्टर और वरिष्ठ अधिकारी शासकीय जमीनों से जुड़े मामलों में गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं। सही तरीके से पैरवी न होने के कारण निजी लोग सरकारी जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है।
कोर्ट ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया और कहा कि यह केवल कानूनी चूक नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा में घोर लापरवाही है। न्यायालय ने राज्य शासन को निर्देश दिया है कि अब शासकीय जमीनों से जुड़े हर मामले में मुख्य सचिव का शपथपत्र पेश किया जाए। सामान्य परिस्थितियों में मुख्य सचिव से इस तरह का एफिडेविट नहीं मांगा जाता, लेकिन बार-बार सामने आ रही लापरवाहियों ने कोर्ट को यह असाधारण कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया है।
न्यायालय का मानना है कि जब तक शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक जमीनी स्तर पर सुधार संभव नहीं है। मुख्य सचिव के शपथपत्र से यह सुनिश्चित होगा कि प्रदेश सरकार स्वयं इन मामलों की गंभीरता को समझे और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नजर रखे।
दरअसल, यह पूरा मामला दतिया जिले की लगभग 2800 वर्गफीट शासकीय जमीन से जुड़ा है, जिस पर विवाद चल रहा है। कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 23 जनवरी तय की है।
इस टिप्पणी के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल है। माना जा रहा है कि अब सरकारी जमीनों से जुड़े मामलों में अधिकारियों की जिम्मेदारी और सख्ती दोनों बढ़ेंगी, ताकि सार्वजनिक संपत्ति को निजी स्वार्थ का शिकार बनने से रोका जा सके।
सरकारी जमीनों पर कब्जे को लेकर हाईकोर्ट की सख्त, लगाई फटकार


