बांग्लादेश। सत्ता परिवर्तन के बाद बनने जा रही नई सरकार का शपथ ग्रहण सिर्फ औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक “रीसेट” का संकेत माना जा रहा है। भारी बहुमत के साथ उभरी Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान पहली बार प्रधानमंत्री पद संभालेंगे। यह समारोह कई मायनों में परंपरा से अलग और रणनीतिक रूप से अहम है।
संसद परिसर में शपथ
जानकारी अनुसार अब तक बांग्लादेश में प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण आमतौर पर बंगभवन के दरबार हॉल में होता रहा है। लेकिन इस बार समारोह राष्ट्रीय संसद के साउथ प्लाजा में आयोजित होगा, जहां राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री और मंत्रियों को शपथ दिलाएंगे।
कैसे बनेगी नई सरकार?
बांग्लादेश के नियमों के अनुसार, चुनाव परिणाम के राजपत्र प्रकाशित होने के तीन दिनों के भीतर सांसदों को शपथ लेनी होती है। 13वें संसदीय चुनाव के बाद 299 में से 297 सीटों के परिणाम अधिसूचित किए जा चुके हैं। सबसे पहले बीएनपी का संसदीय बोर्ड अपने नेता का चुनाव करेगा। इसके बाद वही नेता राष्ट्रपति से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। राष्ट्रपति बहुमत प्राप्त नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करेंगे, जो फिर मंत्रिमंडल का गठन करेंगे।
विदेशी नेताओं की मौजूदगी
सूत्रों के मुताबिक, शपथ ग्रहण समारोह क्षेत्रीय और वैश्विक कूटनीति के लिहाज से भी अहम है। भूटान के प्रधानमंत्री त्शेरिंग टोबगे, मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू, पाकिस्तान के योजना मंत्री अहसान इकबाल और अन्य देशों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति से यह साफ है कि नई सरकार अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नई दिशा देना चाहती है। भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला की मौजूदगी द्विपक्षीय रिश्तों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसके अलावा सऊदी अरब, तुर्की, यूएई, कतर, नेपाल, श्रीलंका और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया है।
समावेशी राजनीति का संकेत
तारिक रहमान ने शपथ से पहले विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर राजनीतिक तापमान कम करने की कोशिश की है। इतना ही नहीं, चुनाव में हारने वाले उम्मीदवारों को भी समारोह में बुलाया गया है। इसे “कॉन्फ्रंटेशन से कंसेंसस” की ओर बढ़ने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। 2024 के जनआंदोलनों और राजनीतिक अस्थिरता के बाद देश को स्थिर दिशा देने की चुनौती उनके सामने है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के सत्ता से हटने के बाद यह पहला पूर्ण जनादेश वाला संक्रमण है।
छोटा मंत्रिमंडल, बड़ा मैसेज
सूत्रों के मुताबिक, नई सरकार मंत्रालयों की संख्या 43 से घटाकर 30 से कम रखने पर विचार कर रही है। विभागों के विलय और प्रशासनिक ढांचे को “लीन और एफिशिएंट” बनाने की तैयारी है। इसे गवर्नेंस मॉडल में “स्ट्रक्चरल रिफॉर्म” की दिशा में कदम माना जा रहा है।


