25 हजार छात्रों का भविष्य अधर में: पांच कैंपस में एक भी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं

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भोपाल। मध्य प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आदिवासी प्रतीक टंट्या भील के नाम पर स्थापित टंट्या भील विश्वविद्यालय में 140 स्वीकृत शैक्षणिक पदों के बावजूद एक भी स्थायी नियुक्ति नहीं है। हालात यह हैं कि करीब 25,000 छात्र-छात्राएं प्रतिनियुक्ति और अस्थायी व्यवस्थाओं के सहारे पढ़ाई कर रहे हैं।

विधानसभा में उठा मुद्दा

जानकारी के मुताबिक, विधानसभा में कांग्रेस विधायक डॉ. झूमा सोलंकी ने प्रश्न उठाया कि विश्वविद्यालय में स्वीकृत पदों के मुकाबले नियुक्तियां कब होंगी। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने बताया कि- 80 असिस्टेंट प्रोफेसर, 40 एसोसिएट प्रोफेसर और 20 प्रोफेसर के पद स्वीकृत हैं, लेकिन सभी रिक्त हैं। भर्ती प्रक्रिया को लेकर समयसीमा पर स्पष्टता नहीं है, जिससे छात्रों और अभिभावकों में असमंजस बना हुआ है।

आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं-

  • कुल छात्र: 25,000
  • स्वीकृत शैक्षणिक पद: 140
  • भरे पद: 0
  • रिक्त पद: 140
  • संचालन: प्रतिनियुक्ति पर निर्भर

साथ ही छात्रों का कहना है कि कक्षाएं नियमित नहीं लग पा रहीं, परीक्षा और परिणाम समय पर घोषित नहीं हो रहे, और कई कोर्स शुरू ही नहीं किए गए हैं। मार्कशीट में देरी के कारण छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं का लाभ भी प्रभावित हो रहा है।

दूसरे विश्वविद्यालयों का भी यही हाल

वहीं राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय में भी 100 स्वीकृत शैक्षणिक पद खाली हैं। बीटेक छात्रों ने बताया कि सीमित फैकल्टी के कारण कई विषयों की पढ़ाई बाधित है। राज्य के 17 सरकारी विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के 1069 स्वीकृत पदों में से 793 पद रिक्त हैं, यानी लगभग 74% पद खाली। पांच विश्वविद्यालय ऐसे हैं जहां एक भी असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त नहीं है।

नीति और जमीन के बीच अंतर

प्रदेश सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के क्रियान्वयन का दावा करती है, लेकिन स्थायी फैकल्टी की कमी से अकादमिक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। भर्ती प्रक्रिया को लेकर मंत्री और विश्वविद्यालय प्रशासन के बयानों में भी समय-सीमा को लेकर अंतर नजर आता है।

बड़ा सवाल

मध्य प्रदेश में आदिवासी आबादी लगभग 22% है और विधानसभा की बड़ी संख्या आदिवासी बहुल क्षेत्रों से आती है। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रतीकों के नाम पर विश्वविद्यालय खोलना पर्याप्त है या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए ठोस प्रशासनिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है? जब कक्षाओं में शिक्षक नहीं होते, तो खाली सिर्फ पद नहीं रहते, पूरी पीढ़ी का भविष्य जोखिम में आ जाता है।

 

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