नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर आज माहौल बेहद गरम रहा। नरेंद्र मोदी ने जहां इसे “ऐतिहासिक अवसर” बताया, वहीं प्रियंका गांधी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें “राजनीतिक बू” साफ नजर आ रही है। संसद में इस मुद्दे पर बहस अब सिर्फ कानून तक सीमित नहीं, बल्कि पॉलिटिकल नैरेटिव और पावर बैलेंस की लड़ाई बन चुकी है।
PM मोदी का विजन: ‘नया लोकतांत्रिक अध्याय’
लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह बिल देश की आधी आबादी को नीति निर्धारण में सीधी भागीदारी देने का “गोल्डन मोमेंट” है। उन्होंने इसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का “टर्निंग पॉइंट” बताते हुए सभी सांसदों से अपील की कि इस मौके को हाथ से न जाने दें।
प्रियंका गांधी का पलटवार
वहीं प्रियंका गांधी ने बिल को लेकर कई बड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि संविधान सभी का है और इसे किसी एक राजनीतिक एजेंडा के तहत नहीं बदला जा सकता। प्रियंका गांधी ने मुख्य बिन्दुओं पर फोकस करते हुए कहा- परिसीमन (Delimitation) को लेकर कोई क्लियर रोडमैप नहीं, सीट बढ़ाने का प्रस्ताव बिना ठोस आधार, OBC प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता और “डेमोक्रेसी पर खतरे” का संकेत है। उनका यह भी कहना था कि अगर यह बिल बिना स्पष्ट ढांचे के पास होता है, तो यह लोकतंत्र के मूल ढांचे को प्रभावित कर सकता है।
क्या है बिल का बड़ा गेमचेंजर फैक्टर?
बता दें महिला आरक्षण बिल का मकसद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% रिजर्वेशन देना है। लेकिन इसके साथ जुड़े कुछ “हाई-इम्पैक्ट एलिमेंट्स” भी हैं-
- सीटों की संख्या में संभावित बढ़ोतरी
- परिसीमन के जरिए नए सिरे से सीटों का बंटवारा
- 2029 से लागू होने की संभावना
- SC/ST महिलाओं के लिए भी आरक्षण
यही पॉइंट्स इस बिल को सिर्फ “सोशल रिफॉर्म” नहीं बल्कि “पॉलिटिकल री-इंजीनियरिंग” बना रहे हैं।
संसद में माहौल
बहस के दौरान संसद में कई बार हल्की नोकझोंक और हंसी का माहौल भी देखने को मिला।
लेकिन अंदरखाने यह साफ है कि यह बिल आने वाले चुनावों और पॉलिटिकल स्ट्रेटजी को बड़ा असर डाल सकता है।


