‘करैरा तेरे डैडी का नहीं’ यह कौन-सी भाषा बोल रहे भाजपा विधायक?

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की आवाज माने जाते हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे कानून, मर्यादा और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करते हुए अपनी बात रखें। लेकिन जब कोई विधायक खुलेआम एक पुलिस अधिकारी को ‘औकात’ में रहने की चेतावनी देता है और कहता है ‘करैरा तेरे डैडी का नहीं है’ तब सवाल सिर्फ एक बयान का नहीं रह जाता, बल्कि राजनीति की बदलती भाषा और सत्ता के बढ़ते अहंकार का बन जाता है।
शिवपुरी जिले के पिछोर से भाजपा विधायक प्रीतम लोधी का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत नाराजगी नहीं माना जा सकता। यह उस मानसिकता की झलक है जिसमें कुछ जनप्रतिनिधि खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। यदि किसी अधिकारी ने विधायक के बेटे से किसी दुर्घटना मामले में नियमानुसार पूछताछ की, तो उसका जवाब कानूनी प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए था, न कि सार्वजनिक धमकी और अपमानजनक भाषा से। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जनता जिन नेताओं को व्यवस्था सुधारने के लिए चुनती है, वही कई बार व्यवस्था पर दबाव बनाते नजर आते हैं। पुलिस और प्रशासन की निष्पक्षता तभी संभव है जब उन्हें राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होकर काम करने दिया जाए। यदि अधिकारी हर कार्रवाई से पहले राजनीतिक प्रतिक्रिया का डर महसूस करेंगे, तो कानून का राज कमजोर होगा और व्यक्तियों का प्रभाव मजबूत। विधायक का यह कहना कि ‘बेटा आएगा भी और चुनाव भी लड़ेगा’ यह भी संकेत देता है कि लोकतंत्र कहीं न कहीं परिवारवाद और राजनीतिक प्रभाव के दायरे में सिमटता जा रहा है। यह संदेश जनता के बीच गलत परंपरा स्थापित करता है कि सत्ता जनसेवा नहीं, बल्कि प्रभाव प्रदर्शन का माध्यम बन गई है। निश्चित रूप से प्रशासनिक तंत्र भी आलोचना से परे नहीं है। यदि किसी अधिकारी की कार्यशैली पक्षपातपूर्ण है तो उसकी शिकायत के लिए संवैधानिक मंच मौजूद हैं। लेकिन सार्वजनिक मंच से भाषा की मर्यादा तोड़ना जनप्रतिनिधि की गरिमा के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, पर लोकतंत्र की आत्मा संवाद में है, दबाव में नहीं। सवाल यह है कि जनता अपने प्रतिनिधियों से नेतृत्व चाहती है या शक्ति प्रदर्शन? क्योंकि जब शब्द मर्यादा खो देते हैं, तब लोकतंत्र भी धीरे-धीरे अपनी गरिमा खोने लगता है।

-मिलिंद ठाकरे

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