पटना: बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने राज्य की दो सबसे बड़ी कमजोरियों को आबादी और पानी बताया है। उनका यह बयान 3 नवंबर को नई दिल्ली में केंद्र और बिहार सरकार के बीच हुए ‘नदी संजीवनी’ समझौते के दौरान आया, जिसमें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी मौजूद थे।
क्यों कहा आबादी और पानी कमजोरी हैं?
सीएम के मुताबिक, बिहार की बड़ी आबादी से जमीन, रोजगार और संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। वहीं राज्य में नदियों का जाल घना होने से गाद जमने के कारण बाढ़ की समस्या गंभीर हो जाती है। मानसून में जल निकासी रुकने से बाढ़ आती है और गर्मी में पानी की कमी चुनौती बनती है। उनका कहना था कि नदियों को व्यवस्थित कर बाढ़ के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
‘नदी संजीवनी’ योजना?
इस पहल के तहत केंद्र और बिहार सरकार मिलकर नदियों और जल निकायों से वैज्ञानिक तरीके से गाद (सिल्ट) निकालेंगी। गाद से नदियों की गहराई और बहाव क्षमता कम हो जाती है। समझौते के तहत केंद्र द्वारा ड्रेजिंग का काम कराया जाएगा और इसके लिए बिहार सरकार से कोई रॉयल्टी नहीं ली जाएगी। निकाली गई मिट्टी का इस्तेमाल नेशनल हाईवे निर्माण में होगा।
आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में चल रही 16 हाईवे परियोजनाओं में 243 लाख घन मीटर और भविष्य की 27 परियोजनाओं में 835 लाख घन मीटर गाद के इस्तेमाल की योजना है। इससे सड़क निर्माण के लिए सामग्री मिलेगी और गाद का पुन: उपयोग भी हो सकेगा।
बिहार की सिल्ट नीति
इससे पहले सितंबर 2026 में बिहार सरकार ने जल स्रोत जीर्णोद्धार और सिल्ट प्रबंधन नीति 2026 को मंजूरी दी थी, जिसका मकसद नदियों और जलाशयों में जमा गाद का बेहतर प्रबंधन है। इसमें किसानों को प्रति 2 हेक्टेयर पर गाद निकालने के लिए 20 हजार रुपये सहायता देने का प्रावधान है।
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क्या बाढ़ खत्म हो जाएगी?
नदियों से गाद निकालना बाढ़ प्रबंधन में अहम कदम है, लेकिन सिर्फ इससे बाढ़ पूरी तरह खत्म नहीं होगी। इसके लिए तटबंधों की मरम्मत, जल निकासी, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और नेपाल से आने वाले पानी के प्रबंधन पर भी काम करना होगा।
कुल मिलाकर ‘नदी संजीवनी’ के जरिए सरकार जल प्रबंधन और बुनियादी ढांचे को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है, जिसका असर इसके जमीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

