नई दिल्ली: देश के बैंकों में जमा होने वाले पैसों की तुलना में कर्ज देने की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में ज्यादा रही है। इसके चलते बैंकों का Credit-Deposit (CD) Ratio 80% के ऊपर पहुंच गया। इस स्थिति को लेकर बैंकिंग सेक्टर में फंड की उपलब्धता से जुड़ी चिंताएं भी सामने आईं, लेकिन Reserve Bank of India (RBI) के सितंबर 2026 बुलेटिन में इसे लेकर स्थिति स्पष्ट की गई है।
Credit-Deposit Ratio?
आसान भाषा में समझें तो अगर किसी बैंक के पास ग्राहकों के ₹100 जमा हैं और उसने ₹80 कर्ज दिया है, तो उसका CD Ratio 80% हुआ।
RBI के मुताबिक FY 2022-23 से बैंकों के कर्ज की ग्रोथ जमा की ग्रोथ से तेज रही है, इसलिए CD Ratio 80% से ऊपर चला गया। मार्च 2026 में सभी बैंकों का औसत CD Ratio करीब 82.2% तक पहुंच गया था।
80% से ज्यादा Ratio का मतलब बैंक खतरे में नहीं
RBI Bulletin में कहा गया है कि केवल ऊंचे Credit-Deposit Ratio के आधार पर बैंकिंग सिस्टम में Funding Vulnerability यानी फंड की कमी का खतरा तय करना सही नहीं है।
आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था में बैंक जब Loan देते या Investment करते हैं, तो इस प्रक्रिया के साथ Deposits भी बन सकते हैं। इसलिए हर बार बैंक को पहले उतनी ही अतिरिक्त जमा राशि जुटानी पड़े, तभी वह नया कर्ज दे सके—ऐसा जरूरी नहीं है।
फिर बैंक कितना कर्ज दे सकते हैं?
इसका मतलब ये भी नहीं कि बैंक बिना किसी सीमा के कर्ज बांट सकते हैं। बैंक के फैसले प्रॉफिटेबिलिटी, रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न, रेगुलेशन और लिक्विडिटी जैसी स्थितियों पर निर्भर करते हैं।
RBI के मुताबिक मार्च 2026 तक ऊंचे CD Ratio के पीछे लायबिलिटी साइड में बदलाव भी वजह रहा। बैंकों ने कम लागत वाले दूसरे फंडिंग सोर्स और कैपिटल का इस्तेमाल किया, जबकि एसेट लेवल पर बदलाव कर क्रेडिट फ्लो बढ़ाया गया।
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Deposit Growth बढ़ने से Ratio में आई नरमी
हाल के महीनों में जमा वृद्धि तेज होने से स्थिति में सुधार हुआ है। अगस्त में डिपॉजिट ग्रोथ मजबूत होने के बाद Incremental CD Ratio में नरमी आई। FY 2026-27 में यह अनुपात मई में 114% तक पहुंच गया था, जिसके बाद गिरावट दर्ज की गई।
RBI का कहना है कि 80% से ऊपर CD Ratio अकेले किसी बैंक के संकट का संकेत नहीं है। बैंक की असली स्थिति समझने के लिए फंडिंग सोर्स, पूंजी, लिक्विडिटी, एसेट क्वालिटी और रेगुलेटरी जरूरतों जैसे दूसरे कारकों को भी देखना जरूरी है।

