ईरान में आर्थिक भूचालः गिरती मुद्रा, भड़कता जनाक्रोश और खामेनेई की रहस्यमयी खामोशी

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क। ईरान इस वक्त गंभीर आर्थिक और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। डॉलर के मुकाबले मुद्रा के ऐतिहासिक पतन ने आम नागरिक की कमर तोड़ दी है। सड़कों पर उतरता गुस्सा, बढ़ती महंगाई और सुप्रीम लीडर अली खामनेई की रहस्यमयी चुप्पी ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है।
ईरान की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है। डॉलर के मुकाबले ईरानी मुद्रा के लगातार गिरने से महंगाई आसमान छू रही है और आम नागरिक का जीवन मुश्किल होता जा रहा है। खाद्य पदार्थों से लेकर ईंधन तक की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी ने बेरोजगारी और गरीबी की आग में घी डालने का काम किया है। इसी के चलते देश के कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन तेज होते जा रहे हैं।
इन प्रदर्शनों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा सुप्रीम लीडर अली खामनेई की चुप्पी को लेकर है। 86 वर्षीय खामनेई न तो सार्वजनिक मंच पर नजर आ रहे हैं और न ही उन्होंने हालात पर कोई बयान दिया है। अमेरिकी मीडिया संस्थान सीएनएन के अनुसार, खामनेई बीमार हो सकते हैं, जबकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुप्पी एक सोची-समझी रणनीति है, ताकि हालात और न भड़कें।
खामनेई की आखिरी सार्वजनिक उपस्थिति 25 दिसंबर को हुई थी, जब उन्होंने वरिष्ठ मौलानाओं से मुलाकात की और क्रिसमस का संदेश जारी किया। इसके बाद 27 दिसंबर से शुरू हुए प्रदर्शनों पर उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि अगर सुप्रीम लीडर ने कोई सख्त या भावनात्मक बयान दिया, तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है।
इस बीच राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को हालात संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वे लगातार सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन के संपर्क में हैं। सरकार प्रदर्शन को विदेशी साजिश करार दे रही है और दावा कर रही है कि राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में है। अब तक गोलीबारी में सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। यह ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार है, जब इतने बड़े स्तर पर आर्थिक मुद्दों को लेकर जनाक्रोश सामने आया है।
इसी बीच खामनेई के उत्तराधिकारी को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, उनके बेटे मोजतबा खामनेई और क्रांति के संस्थापक खुमैनी के पोते हुसैन खुमैनी सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। अंतिम फैसला हालांकि सुप्रीम लीडर को ही करना है।
ईरान के मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि यह संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सत्ता और भविष्य की दिशा तय करने वाला मोड़ भी बन सकता है।