शिक्षकों के बहाने बीजेपी के भीतर ही बढ़ रही असहमति?

संपादकीय। मिलिंद ठाकरे

मध्यप्रदेश की भाजपाई सियासत में इन दिनों एक दिलचस्प असहजता-असहमति उभरकर सामने आ रही है। होशंगाबाद से बीजेपी सांसद दर्शन सिंह चौधरी का अपनी ही सरकार के फैसले के खिलाफ मुखर होना महज शिक्षकों के मुद्दे तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि यह सत्ता के भीतर पनप रही असहजता की ओर भी इशारा करता है। डेढ़ लाख शिक्षकों के भविष्य को लेकर उठी चिंता निश्चित रूप से अहम है, लेकिन जिस तरह से एक सत्तारूढ़ दल का सांसद खुलकर मोहन सरकार के फैसले पर सवाल खड़ा कर रहा है, वह राजनीतिक दृष्टि से कहीं ज्यादा मायने रखता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को चिट्ठी लिखकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने की मांग करना सीधे-सीधे राज्य सरकार के निर्णय पर अविश्वास जताने जैसा है। दरअसल, पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य किए जाने के फैसले ने वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को असमंजस में डाल दिया है। लेकिन यह मुद्दा अब केवल शैक्षणिक नहीं रहा, यह राजनीतिक असहमति का माध्यम बनता जा रहा है। सांसद चौधरी ने जिस तरह से शिक्षकों के अनुभव और योगदान को आधार बनाकर सरकार को घेरा है, उससे यह साफ है कि वे जनभावनाओं के साथ-साथ कुछ राजनीतिक संदेश भी दे रहे हैं। इससे पहले बीजेपी के पूर्व विधायक मुरलीधर पाटीदार भी सरकार को चेतावनी दे चुके हैं। उन्होंने आदेश को निरस्त करने की मांग करते हुए उग्र आंदोलन की आशंका जताई थी। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि पार्टी के भीतर ही एक वर्ग सरकार के फैसलों से असहज है और इस बहाने उसे मोहन सरकार खुलकर घेरने का मुद्दा हाथ लग गया है। यह स्थिति किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए संकेत होती है। जब अपने ही नेता सार्वजनिक रूप से फैसलों पर सवाल उठाने लगें, तो यह केवल नीति की खामी नहीं, बल्कि आतंरिक संवादहीनता और असंतोष का परिणाम भी होती है। खासकर तब, जब मामला सीधे-सीधे लाखों लोगों के भविष्य से जुड़ा हो। मोहन सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का है। क्या यह केवल शिक्षकों का मुद्दा है, या फिर इसके बहाने पार्टी के भीतर दबे स्वर अब सतह पर आ रहे हैं? यदि सरकार ने इसे यूं ही नजरअंदाज किया, तो यह असंतोष और गहरा सकता है। राजनीति में संकेतों को समय रहते समझना ही कुशल नेतृत्व की पहचान होती है। शिक्षकों का मुद्दा सुलझाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है, अपने ही घर में उठ रही आवाजों को सुनना और उनके निहितार्थ को समझना।

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