✍️ नीरज तिवारी (शिक्षाविद, राजनीतिक विश्लेषक एवं सामाजिक विचारक)
राहुल गांधी का वोटचोरी का आरोप कांग्रेस पर ही भारी पड़ गया, संसद में राहुल गांधी द्वारा लगाए गए वोटचोरी के आरोप, अंततः कांग्रेस की ही राजनीतिक विरासत का आईना बन गए। चुनाव सुधार पर हुई चर्चा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तथ्यों के साथ यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर सवाल उठाने से पहले कांग्रेस को अपने इतिहास की फाइलें खोलनी चाहिए।
राहुल गांधी आरोप लगाते हैं, लेकिन सबूत नहीं देते। इसके उलट अमित शाह ने नेहरू से लेकर सोनिया गांधी तक तीनों पीढ़ियों के उदाहरण संसद के रिकॉर्ड पर रख दिए। यह बहस भावनाओं की नहीं, तथ्यों की थी, और उसी में कांग्रेस कमजोर पड़ गई।
अमित शाह ने वोटचोरी के तीन स्वरूप गिनाए
पहला, जनादेश को नज़रअंदाज़ कर सत्ता हथियाना।
दूसरा, अनुचित साधनों से चुनाव जीतना। और तीसरा, अयोग्य होते हुए भी मतदाता सूची में नाम शामिल होना। पहले प्रकार का उदाहरण जवाहरलाल नेहरू का है। आज़ादी के समय कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्षों को प्रधानमंत्री चुनना था। 28 में से 26 मत सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में थे, फिर भी प्रधानमंत्री नेहरू बने। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार करने का उदाहरण था। दूसरा उदाहरण रायबरेली से इंदिरा गांधी का है, जहाँ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनका चुनाव रद्द किया और यह माना कि चुनाव अनुचित तरीकों से जीता गया था। तीसरा मामला सोनिया गांधी से जुड़ा है, जिन पर भारतीय नागरिकता लेने से पहले मतदाता सूची में नाम दर्ज होने को लेकर अदालत ने नोटिस जारी किया था। योग्यता के बिना मतदाता बनना भी वोटचोरी का ही एक रूप है। राहुल गांधी जिस कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं, उस पार्टी के पास सत्ता का लंबा इतिहास है अच्छे निर्णयों के साथ-साथ कई गलत परंपराओं का भी। यही कारण है कि जब कांग्रेस आज चुनाव सुधार की बात करती है, तो उसका अतीत उसके सामने खड़ा हो जाता है।
अमित शाह ने स्पष्ट किया कि आज़ादी के बाद 73 वर्षों तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का कोई कानून नहीं था। प्रधानमंत्री की इच्छा ही नियम थी। पहली बार मोदी सरकार ने नियुक्ति की प्रक्रिया को कानून के दायरे में लाया और उसमें विपक्ष के नेता को भी शामिल किया।
पहले निर्णय 100% कार्यपालिका का था, अब 33% भागीदारी विपक्ष की है—इसे लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, मजबूती कहा जाता है।
न्यायपालिका के सीधे हस्तक्षेप को लेकर भी अमित शाह ने साफ़ कहा कि लोकतंत्र में कार्यपालिका के फैसलों का मूल्यांकन जनता करती है, न कि अदालतें।
चुनाव आयोग को दी गई इम्यूनिटी पर भी राहुल गांधी का आरोप तथ्यहीन निकला। जन प्रतिनिधित्व कानून में यह व्यवस्था शुरू से मौजूद है—कांग्रेस के शासनकाल में भी थी। सरकार ने इसमें कोई नया संरक्षण नहीं जोड़ा।
सीसीटीवी फुटेज को 45 दिन बाद नष्ट करने को लेकर लगाए गए आरोप भी भ्रम फैलाने वाले साबित हुए। कानून में स्पष्ट है कि चुनाव याचिकाएँ 45 दिन के भीतर दाखिल होनी चाहिए। इसी अवधि तक संबंधित फुटेज सुरक्षित रखे जाते हैं। जब कांग्रेस समय पर कानूनी प्रक्रिया अपनाती ही नहीं, तो बाद में हंगामा किस बात का ? मतदाता सूची में गड़बड़ी की शिकायत भी कांग्रेस ही करती है, लेकिन जब चुनाव आयोग शुद्धिकरण के लिए SIR अभियान शुरू करता है, तो वही कांग्रेस उसका विरोध करने लगती है।
2014 से अब तक कांग्रेस ने चुनाव सुधार पर एक भी औपचारिक सुझाव आयोग को नहीं दिया सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और आरोप।
EVM पर सवाल भी वही पुराना चयनात्मक नैतिकता का उदाहरण है। EVM को कानूनी मान्यता राजीव गांधी की सरकार में मिली थी। 2004 में जब EVM के ज़रिए कांग्रेस जीती, तब न मशीन पर सवाल थे, न लोकतंत्र खतरे में था।
आज कांग्रेस की समस्या सिर्फ़ चुनाव हारना नहीं है—समस्या है विचारहीनता, जनसंपर्क से कटाव और इतिहास से न सीखने की जिद।
झूठे मुद्दे, स्क्रिप्टेड भाषण और पारिवारिक आत्ममुग्धता लोकतंत्र को नहीं, केवल भ्रम को जन्म देती है।
अंततः सच और झूठ का फैसला न संसद करती है, न प्रेस कॉन्फ्रेंस,फैसला करता है मतदाता।
और भारतीय मतदाता ने बार-बार यह साबित किया है कि उसका विवेक किसी भी परिवार, किसी भी आरोप और किसी भी भ्रम से बड़ा है।


