नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र ने एक बार फिर राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है। जहां एक तरफ महिला आरक्षण को लेकर ऐतिहासिक निर्णय की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ इसके क्रियान्वयन और टाइमलाइन को लेकर विपक्ष और सरकार आमने-सामने हैं।
राज्यसभा में हरिवंश का तीसरी बार चुनाव
बता दें जनता दल (यू) के वरिष्ठ नेता हरिवंश को लगातार तीसरी बार राज्यसभा का उपसभापति चुना गया है। यह सिर्फ एक औपचारिक जीत नहीं, बल्कि सदन में उनके संतुलित संचालन और अनुभव पर भरोसे का संकेत माना जा रहा है।
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई देते हुए कहा “उनका कार्यकाल “सहजता, संवाद और समावेशी नेतृत्व” का उदाहरण रहा है।”
विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मौके पर लोकसभा में डिप्टी स्पीकर की नियुक्ति न होने पर सवाल उठाए।
महिला आरक्षण बिल
जानकारी के मुताबिक, महिला आरक्षण अधिनियम 2023 के लागू होने की अधिसूचना जारी होने के बाद संसद में बहस और तेज हो गई है। सरकार का दावा है कि यह “महिला सशक्तिकरण की दिशा में गेम-चेंजर” साबित होगा।
केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने सभी दलों से इसे समर्थन देने की अपील करते हुए कहा “यह सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का रोडमैप है।”
लेकिन विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है। कांग्रेस नेता के सी वेणुगोपाल ने सवाल उठाया कि जब बिल 2023 में पास हुआ था, तो इसके लागू होने में देरी क्यों हुई? उन्होंने सर्वदलीय बैठक बुलाने और संशोधनों पर पुनर्विचार की मांग की।
कब होगा लागू?
सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि यह आरक्षण वास्तव में कब लागू होगा। सरकार संकेत दे रही है कि परिसीमन (delimitation) के बाद इसे लागू किया जाएगा, जो संभवतः 2029 के आसपास हो सकता है।
यहां विपक्ष का आरोप है कि सरकार “राजनीतिक लाभ के लिए जल्दबाजी में घोषणा कर रही है, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन टाल रही है।”
सदन के भीतर रणनीति और शक्ति परीक्षण
संसद परिसर में विपक्षी दलों की एक अहम बैठक हुई, जिसमें पहली बार बीजेडी की भागीदारी भी देखने को मिली। बैठक में यह रणनीति बनाई गई कि अधिकतम सांसदों की उपस्थिति सुनिश्चित कर सरकार पर दबाव बनाया जाए।
सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी आज लोकसभा में सरकार को घेर सकते हैं, जबकि गृह मंत्री अमित शाह जवाबी रणनीति के साथ तैयार हैं।
बता दें कि आज शाम 4 बजे महिला आरक्षण बिल पर वोटिंग प्रस्तावित है। ऐसे में यह साफ है कि संसद का यह सत्र सिर्फ विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति परीक्षण और भविष्य की रणनीति तय करने का मंच बन चुका है।


