तमाम कानूनी पचड़ों में फंसे कटनी जिले की विजयराघवगढ़ सीट से भाजपा विधायक संजय पाठक एक बार फिर ‘जनता की अदालत’ में जाने की तैयारी कर रहे हैं। 51प्रतिशत से कम समर्थन मिलने पर इस्तीफा देने की उनकी घोषणा सुनने में लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का उदाहरण लगती है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी कम दिलचस्प नहीं हैं। लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है, यह बात निर्विवाद है। ऐसे में कोई जनप्रतिनिधि खुद पहल करके अपनी स्वीकार्यता का आकलन करना चाहता है, तो यह एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। पाठक का घर-घर जाकर लोगों से पूछना कि मुझे विधायक रहना चाहिए या नहीं, एक तरह से जवाबदेही की भावना को दर्शाता है। यह राजनीति में बढ़ती दूरी और अविश्वास के माहौल में एक अलग प्रयोग भी है। हालांकि, इस पहल का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह कदम ऐसे समय पर उठाया जा रहा है, जब पाठक कानूनी विवादों और आरोपों के घेरे में हैं। जमीन घोटाले, माइनिंग और अन्य मामलों को लेकर चल रही जांचों के बीच यह ‘जनादेश’ कहीं अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति तो नहीं? जनता के बीच जाकर समर्थन जुटाना और उसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना, आलोचनाओं के बीच एक मजबूत राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन सकता है। इसके अलावा, यह भी सवाल उठता है कि क्या इस तरह के निजी ‘जनादेश’ वास्तव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विकल्प हो सकते हैं? चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रक्रिया और संवैधानिक ढांचे के बाहर किए गए ऐसे प्रयोग कितने निष्पक्ष और पारदर्शी होंगे, यह भी विचारणीय है। फिर भी, अगर यह पहल ईमानदारी से की जाती है और वास्तव में जनता की राय को महत्व दिया जाता है, तो यह राजनीति में जवाबदेही का एक नया मॉडल बन सकती है। लेकिन यदि यह सिर्फ एक छवि सुधार अभियान बनकर रह गया, तो इसका प्रभाव भी उतना ही सीमित रहेगा। यह प्रयोग संजय पाठक के लिए जितना जोखिम भरा है, उतना ही यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता और नीयत की भी परीक्षा है।
-मिलिंद ठाकरे

