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बिजली चोरी का ‘स्मार्ट’ सिंडिकेट, एक बड़ी चुनौती!

मप्र की राजधानी भोपाल अब सिर्फ झीलों और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के लिए नहीं, बल्कि बिजली चोरी के अत्याधुनिक  एवं स्मार्ट तारीकों के कारण भी चर्चा में है। हर वर्ष औसतन 7,160 बिजली चोरी के मामलों का सामने आना और इससे बिजली कंपनी को करीब 26.80 करोड़ रुपए का नुकसान होना केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि बिजली कंपनी के लिए गंभीर चेतावनी है। चिंता की बात यह है कि बिजली चोरी अब पारंपरिक ‘कटिया’ तक सीमित नहीं रही। शातिर तत्व अब स्मार्ट मीटर की पीसीबी से छेड़छाड़, न्यूट्रल वायर बदलकर रीडिंग कम करना, फीडर पिलर टैपिंग और अंडरग्राउंड केबल जैसी हाईटेक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कई जगह दीवारों और फर्श के भीतर अवैध वायरिंग छिपाकर पूरी इमारतों को बिजली सप्लाई दी जा रही है। यह बताता है कि चोरी अब संगठित अपराध का रूप ले चुकी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मार्ट ग्रिड और डिजिटल मॉनिटरिंग जैसी उन्नत व्यवस्थाओं के बावजूद अपराधी लगातार सिस्टम को कैसे चुनौती दे रहे हैं? इसका सीधा अर्थ है कि तकनीक के साथ निगरानी, जवाबदेही और कानूनी सख्ती भी उतनी ही जरूरी है। केवल मीटर बदलने या डिजिटल सिस्टम लगाने से समस्या खत्म नहीं होगी, जब तक चोरी करने वालों में कानून का भय पैदा नहीं किया जाएगा। बिजली कंपनी द्वारा थर्मल स्कैनर, लोड एनालिसिस और डिजिटल डेटा मिलान जैसी तकनीकों का उपयोग सकारात्मक कदम है। लेकिन यह लड़ाई केवल कंपनी की नहीं, समाज की भी है। बिजली चोरी का नुकसान अंततः ईमानदार उपभोक्ताओं को अधिक बिल और कमजोर बिजली व्यवस्था के रूप में भुगतना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि बिजली चोरी को छोटी चालाकी नहीं, बल्कि आर्थिक अपराध माना जाए। संगठित चोरी में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई, भारी जुर्माना और सार्वजनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। साथ ही नागरिकों को भी समझना होगा कि चोरी की बिजली से रोशनी भले मिल जाए, लेकिन उससे व्यवस्था का अंधेरा और गहरा होता है।

 

-मिलिंद ठाकरे

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