मप्र की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्ता, सामाजिक न्याय और कानून आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में हुई सुनवाई ने न सिर्फ राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाई है, बल्कि आरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य सरकार द्वारा उच्च स्तरीय जांच समिति गठित करने और 60 दिनों में रिपोर्ट पेश करने का आश्वासन एक सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक व्यवस्था की परीक्षा है, जिस पर सामाजिक न्याय की नींव टिकी हुई है। यदि आरोप सही साबित होते हैं कि गलत तरीके से अनुसूचित जाति (एससी) का प्रमाण पत्र बनवाकर चुनाव लड़ा गया, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि उन वास्तविक हकदारों के अधिकारों पर भी सीधा प्रहार है, जिनके लिए आरक्षण व्यवस्था बनाई गई है याचिकाकर्ता द्वारा पुराने जनगणना आंकड़ों, राजपत्र और पूर्व समिति के निर्णयों का हवाला देना इस मामले को और गंभीर बनाता है। यह संकेत देता है कि विवाद केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं, बल्कि दस्तावेजी आधार भी रखता है। ऐसे में जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह मामला सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बड़े मुद्दे के रूप में उभर सकता है। कांग्रेस पहले ही इसे राजनीतिक हथियार बना चुकी है, जबकि सरकार पर दबाव है कि वह निष्पक्षता साबित करे। कोर्ट की सख्त टिप्पणी कि, समयसीमा में जांच पूरी न होने पर फिर सुनवाई होगी, जो इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका भी इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है। अंततः, यह मामला केवल एक मंत्री के भविष्य का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो जनता लोकतांत्रिक संस्थाओं और नीतियों पर करती है। सच्चाई जो भी हो, उसे सामने आना ही चाहिए, ताकि न्याय एक बार फिर कसौटी पर खरा साबित हो सके। क्योंकि, न्यायपालिका और संविधान से कोई भी ऊपर नहीं हो सकता।
-मिलिंद ठाकरे


